पाकिस्तान की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है जहाँ शहबाज शरीफ सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को सहयोग का औपचारिक प्रस्ताव दिया है। सोमवार 23 फरवरी को नेशनल असेंबली में प्रधानमंत्री के सलाहकार राणा सनाउल्लाह ने पीटीआई के नेतृत्व से 'लोकतंत्र चार्टर 2006' पर हस्ताक्षर करने और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए साथ आने की अपील की। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार यह कदम पाकिस्तान की राजनीति में सेना के हस्तक्षेप को कम करने और नागरिक शासन को प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।
राणा सनाउल्लाह का संसद में औपचारिक प्रस्ताव
संसद की कार्यवाही के दौरान प्रधानमंत्री के सलाहकार राणा सनाउल्लाह ने पीटीआई नेताओं को संबोधित करते हुए कहा कि देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए सभी राजनीतिक दलों को एक मंच पर आना होगा। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार पीटीआई के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है बशर्ते वे लोकतंत्र चार्टर 2006 के सिद्धांतों को स्वीकार करें। सनाउल्लाह ने सदन में कहा कि यदि पीटीआई नेतृत्व आगे आता है तो सरकार लोकतंत्र की स्थिति में सुधार के लिए हर संभव कदम उठाएगी और यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान में सरकार और विपक्ष के बीच लंबे समय से गतिरोध बना हुआ है।
लोकतंत्र चार्टर 2006 का ऐतिहासिक संदर्भ
लोकतंत्र चार्टर 2006 पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसे 14 मई 2006 को लंदन में नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था। इस चार्टर का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान में सैन्य तानाशाही के दौर को समाप्त करना और यह सुनिश्चित करना था कि सेना भविष्य में कभी भी राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप न करे। इस दस्तावेज में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने, न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और प्रधानमंत्री के पद को संवैधानिक रूप से अधिक शक्तिशाली बनाने के प्रावधान शामिल थे। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता के कारण इस चार्टर के कई प्रावधानों पर अमल नहीं हो सका है।
सेना की भूमिका और संवैधानिक चुनौतियां
पाकिस्तान में सेना की भूमिका हमेशा से चर्चा का विषय रही है। वर्तमान सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के कार्यकाल में सेना का प्रभाव प्रशासनिक और आर्थिक निर्णयों में भी देखा गया है। रिपोर्टों के अनुसार आसिम मुनीर को आजीवन सुरक्षा और विशेष अधिकार प्राप्त हैं जो उन्हें पूर्ववर्ती सेना प्रमुखों की तुलना में अधिक शक्तिशाली बनाते हैं। शहबाज सरकार द्वारा लोकतंत्र चार्टर को फिर से जीवित करने का प्रयास सीधे तौर पर सेना की शक्तियों को संवैधानिक दायरे में सीमित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। यदि पीटीआई इस चार्टर पर हस्ताक्षर करती है तो यह पाकिस्तान के संसदीय इतिहास में नागरिक सर्वोच्चता की दिशा में एक बड़ा बदलाव हो सकता है।
पीटीआई और सेना के बीच संभावित बातचीत
यह प्रस्ताव ऐसे समय में दिया गया है जब पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में इमरान खान और सेना के बीच संभावित समझौते की खबरें भी तैर रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सेना प्रमुख ने अपने करीबी सहयोगी मोहसिन नकवी को पीटीआई नेतृत्व के साथ बातचीत के लिए नियुक्त किया है। सरकार की ओर से दिया गया यह नया प्रस्ताव संभवतः इसी संभावित 'डील' को संतुलित करने या विफल करने का एक प्रयास है। विपक्षी नेताओं ने सदन में इमरान खान की रिहाई की मांग उठाई जिस पर राणा सनाउल्लाह ने सकारात्मक बातचीत और चार्टर पर सहमति की शर्त रखी।
संसदीय प्रतिक्रिया और भविष्य की रूपरेखा
सरकार के इस प्रस्ताव के बाद संसद में हलचल तेज हो गई है। पीटीआई के वरिष्ठ नेताओं ने अभी तक इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन पार्टी के भीतर इस पर विचार-विमर्श जारी है। जानकारों के अनुसार यदि दोनों पक्ष 2006 के चार्टर पर सहमत होते हैं तो पाकिस्तान में चुनाव सुधारों और संवैधानिक संशोधनों का नया दौर शुरू हो सकता है। सरकार का तर्क है कि जब तक सभी राजनीतिक दल सेना के हस्तक्षेप के खिलाफ एकजुट नहीं होंगे तब तक पाकिस्तान में स्थिर लोकतंत्र की स्थापना संभव नहीं है। आने वाले दिनों में पीटीआई का रुख यह तय करेगा कि पाकिस्तान की सत्ता संरचना में सेना का प्रभाव कम होगा या वर्तमान स्थिति बनी रहेगी।
