राजस्थान सरकार ने राज्य के राज्य वृक्ष खेजड़ी के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए इसकी कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। यह प्रतिबंध तब तक प्रभावी रहेगा जब तक कि राज्य विधानसभा में इसके लिए एक विशिष्ट और ठोस कानून पारित नहीं हो जाता। बीकानेर में पिछले 11 दिनों से चल रहे 'खेजड़ी बचाओ आंदोलन' के महापड़ाव को गुरुवार देर रात राज्य मंत्री केके विश्नोई के आश्वासन और सरकारी सर्कुलर के बाद आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया गया। मंत्री ने स्वयं प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंचकर सरकार का आधिकारिक पत्र सौंपा, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान विधानसभा सत्र में ही खेजड़ी संरक्षण के लिए नए नियम और कानूनी प्रावधान लाए जाएंगे।
सरकारी सर्कुलर और मंत्री का आधिकारिक आश्वासन
बीकानेर में जारी विरोध प्रदर्शन के बीच राज्य मंत्री केके विश्नोई सरकार का आधिकारिक पत्र लेकर धरना स्थल पर पहुंचे। उनके साथ राज्य जीव-जंतु कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष जसवंत सिंह विश्नोई, पबाराम विश्नोई और पूर्व विधायक बिहारी लाल विश्नोई भी मौजूद थे। मंत्री ने आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार पर्यावरण संरक्षण के प्रति पूरी तरह गंभीर है और खेजड़ी की महत्ता को समझते हुए इसकी कटाई को रोकने के लिए तत्काल प्रभाव से सर्कुलर जारी कर दिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, इस सर्कुलर के लागू होने के बाद अब पूरे राजस्थान में किसी भी परियोजना या व्यक्तिगत कार्य के लिए खेजड़ी के पेड़ों को काटना अवैध माना जाएगा।
महापड़ाव की समाप्ति और आंदोलनकारियों की प्रतिक्रिया
आंदोलन के मुख्य संयोजक राम गोपाल बिश्नोई ने मंच से घोषणा की कि सरकार द्वारा लिखित आश्वासन मिलने के बाद 11 दिनों से जारी महापड़ाव को स्थगित किया जा रहा है। उन्होंने इसे समाज और पर्यावरण प्रेमियों के संघर्ष की जीत बताया। आंदोलनकारियों ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह केवल बिश्नोई समाज की नहीं, बल्कि उन सभी 36 कौमों की जीत है जिन्होंने इस अभियान में अपना सहयोग दिया। महापड़ाव के समापन के दौरान मंच पर 'नानी बाई को मायरो' के गीतों का गायन किया गया, जिसे शुभ संकेत के रूप में देखा गया। संतों और स्थानीय नेताओं ने एकजुटता बनाए रखने पर जोर दिया ताकि भविष्य में भी पर्यावरण की रक्षा की जा सके।
खेजड़ी संरक्षण और अमृता देवी का ऐतिहासिक संदर्भ
खेजड़ी का पेड़ राजस्थान की पारिस्थितिकी और संस्कृति में एक विशेष स्थान रखता है। आंदोलन के दौरान वक्ताओं ने 1730 के खेजड़ली बलिदान का स्मरण किया, जहां अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। खेजड़ी को 'मरुस्थल का कल्पवृक्ष' कहा जाता है क्योंकि यह भीषण गर्मी और सूखे में भी जीवित रहता है और स्थानीय पशुधन के लिए चारे का मुख्य स्रोत है। आंदोलनकारियों का तर्क था कि आधुनिक विकास के नाम पर इस ऐतिहासिक और पारिस्थितिक विरासत को नष्ट नहीं किया जा सकता। सरकार ने अब स्वीकार किया है कि खेजड़ी के लिए एक अलग और सख्त कानून की आवश्यकता है जो इसे अन्य सामान्य पेड़ों की तुलना में अधिक सुरक्षा प्रदान करे।
सोलर प्लांट और पर्यावरण संबंधी चिंताएं
इस आंदोलन की मुख्य जड़ पश्चिमी राजस्थान में तेजी से फैल रहे सोलर पावर प्लांट थे और आंदोलनकारियों के अनुसार, सौर ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार के दौरान हजारों की संख्या में खेजड़ी के पेड़ों को काटा जा रहा था। राम गोपाल बिश्नोई ने आरोप लगाया कि सोलर कंपनियों ने विकास की आड़ में पर्यावरण का विनाश किया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से मरुस्थलीकरण बढ़ रहा है और वन्यजीवों के आवास नष्ट हो रहे हैं। सरकार ने अब यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि किसी भी नई परियोजना के लिए खेजड़ी के पेड़ों को नुकसान न पहुंचाया जाए और वैकल्पिक मार्गों या तकनीकों का उपयोग किया जाए।
आगामी विधायी प्रक्रिया और कानूनी ढांचा
राज्य सरकार के अनुसार, खेजड़ी संरक्षण के लिए प्रस्तावित कानून में कड़े दंड और जुर्माने के प्रावधान शामिल किए जाएंगे। वर्तमान में पेड़ों की कटाई के लिए जो सामान्य नियम हैं, उन्हें खेजड़ी के मामले में और अधिक सख्त बनाया जाएगा। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि नए कानून के तहत खेजड़ी की कटाई को एक गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखने पर विचार किया जा रहा है। इसके अलावा, वन विभाग को विशेष निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में खेजड़ी के पेड़ों की गणना करें और उनकी सुरक्षा के लिए गश्त बढ़ाएं। आगामी विधानसभा सत्र में इस विधेयक के पेश होने की संभावना है, जिससे राजस्थान में वृक्ष संरक्षण के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ेगा।
