केरल के ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में केंद्र सरकार ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष दाखिल एक हलफनामे में केंद्र ने मासिक धर्म वाली महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का कड़ा विरोध किया है। सरकार ने तर्क दिया है कि धार्मिक आस्था और परंपराओं से जुड़े मामलों में अदालतों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यह सुनवाई उन पुनर्विचार याचिकाओं पर आधारित है जो 2018 के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थीं, जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी।
धार्मिक आस्था और न्यायिक समीक्षा की सीमाएं
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में स्पष्ट रूप से कहा है कि अदालतें आस्था या विश्वास के विषयों पर फैसला करने के लिए उपयुक्त मंच नहीं हैं। सरकार के अनुसार, न्यायिक समीक्षा की प्रक्रिया को संवैधानिक सिद्धांतों का सम्मान करना चाहिए, लेकिन साथ ही धार्मिक मानदंडों और प्रथाओं को संबंधित समुदायों के विवेक पर छोड़ देना चाहिए और हलफनामे में कहा गया है कि अदालतों को 'आवश्यक धार्मिक प्रथाओं' या किसी देवता के विशिष्ट गुणों की पुनर्व्याख्या करने से बचना चाहिए। केंद्र का मानना है कि आस्था एक व्यक्तिगत और सामुदायिक विषय है, जिसे कानूनी तराजू पर तौलना धार्मिक स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों के विपरीत हो सकता है।
भगवान अय्यप्पा की प्रकृति और ब्रह्मचर्य का तर्क
सरकार ने मंदिर की परंपराओं का बचाव करते हुए भगवान अय्यप्पा की विशिष्ट प्रकृति का उल्लेख किया है। हलफनामे में कहा गया है कि भगवान अय्यप्पा एक 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' हैं और परंपरा के अनुसार वे महिलाओं से विमुख रहते हैं। केंद्र ने तर्क दिया कि अय्यप्पा भक्त एक अलग संप्रदाय के रूप में देखे जाने चाहिए जिनकी अपनी विशिष्ट मान्यताएं और रीति-रिवाज हैं। इन प्रथाओं का पालन करना भक्तों के धार्मिक अधिकारों का हिस्सा है और सरकार के अनुसार, मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध किसी भेदभाव की भावना से नहीं, बल्कि देवता की ब्रह्मचारी प्रकृति को बनाए रखने के लिए सदियों से चली आ रही एक धार्मिक आवश्यकता है।
अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संवैधानिक प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ वर्तमान में संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे की जांच कर रही है। ये अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संप्रदायों को अपने मामलों का प्रबंधन करने के अधिकार से संबंधित हैं। केंद्र ने तर्क दिया है कि 'आवश्यक धार्मिक प्रथाओं' के सिद्धांत को इस तरह से लागू किया जाना चाहिए कि वह धार्मिक स्वायत्तता की रक्षा करे। सरकार का रुख है कि यदि कोई प्रथा किसी धर्म का अभिन्न अंग है, तो उसे केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए कि वह आधुनिक सामाजिक मानदंडों के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाती। अदालत अब इस पर विचार कर रही है कि क्या न्यायपालिका को यह तय करने का अधिकार है कि कौन सी प्रथा धर्म के लिए 'आवश्यक' है।
2018 के फैसले पर पुनर्विचार का समर्थन
केंद्र सरकार ने साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले पर पुनर्विचार करने का समर्थन किया है, जिसने मंदिर के द्वार सभी महिलाओं के लिए खोल दिए थे। सरकार का तर्क है कि यह मुद्दा केवल लैंगिक समानता का नहीं है, बल्कि यह एक गहरी धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा हुआ है। हलफनामे में उल्लेख किया गया है कि 2018 के फैसले ने उन लाखों भक्तों की भावनाओं और मंदिर की मूल परंपराओं को नजरअंदाज किया जो देवता के स्वरूप में विश्वास रखते हैं। सरकार ने अदालत से आग्रह किया है कि वह इस मामले को केवल समानता के चश्मे से न देखकर धार्मिक विविधता और संप्रदायों के अधिकारों के संदर्भ में देखे।
न्यायिक प्रक्रिया और भविष्य की दिशा
सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुई यह सुनवाई न केवल सबरीमाला मंदिर के भविष्य को तय करेगी, बल्कि यह भारत में धर्म और कानून के बीच के संबंधों को भी नई दिशा दे सकती है। नौ न्यायाधीशों की पीठ इस बात पर विस्तृत चर्चा कर रही है कि क्या कोई व्यक्ति जो उस विशेष धार्मिक संप्रदाय का हिस्सा नहीं है, वह उस धर्म की प्रथाओं को चुनौती देने वाली जनहित याचिका दायर कर सकता है। केंद्र के हलफनामे ने इस कानूनी बहस को और अधिक जटिल बना दिया है, क्योंकि अब यह मामला सीधे तौर पर राज्य की शक्तियों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का बन गया है। आने वाले दिनों में अदालत विभिन्न पक्षों की दलीलों को सुनकर यह निर्धारित करेगी कि संवैधानिक नैतिकता और धार्मिक आस्था के बीच की रेखा कहां खींची जानी चाहिए।
