फरवरी के महीने में शुरू हुए ईरान युद्ध के बाद अब संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी रणनीति में आमूलचूल बदलाव कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह संकल्प लिया है कि वह ईरान पर अब तक का सबसे भीषण आर्थिक प्रहार करेंगे और वाशिंगटन का मुख्य उद्देश्य ईरान के उन तमाम रास्तों को पूरी तरह बंद करना है जहां से उसे वित्तीय सहायता या राजस्व प्राप्त होता है। इसी संदर्भ में अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण बयान जारी किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वाशिंगटन अगले सप्ताह तेहरान पर ऐसे कठोर प्रतिबंध लागू करेगा जो वैश्विक स्तर पर पहले कभी नहीं देखे गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सोमवार को दोपहर 2 बजे ईस्टर्न टाइम पर उनकी एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस होने वाली है जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं।
ऐतिहासिक विवाद और वर्तमान स्थिति
अमेरिका और ईरान के बीच यह विवाद कोई नई बात नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ 1970 के दशक के अंत से ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मानवाधिकारों के हनन और उग्रवादी समूहों को समर्थन देने के आरोपों के चलते प्रतिबंध लगाते रहे हैं। हालांकि फरवरी में युद्ध की शुरुआत के बाद से परिस्थितियां बहुत तेजी से बदली हैं। वाशिंगटन ने समुद्री, ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्रों में कई नए कड़े प्रतिबंध लगाए हैं और इसके साथ ही समुद्री नाकेबंदी की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है ताकि ईरान के व्यापारिक हितों को चोट पहुंचाई जा सके।
प्रतिबंधों का व्यापक दायरा और आंकड़े
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल यानी ओएफएसी के आंकड़ों पर नजर डालें तो ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से अब तक 1000 से अधिक व्यक्तियों, समुद्री जहाजों और विमानों पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। इसके अतिरिक्त ईरान से जुड़ी लगभग 500 मिलियन डॉलर की क्रिप्टोकरेंसी को भी फ्रीज कर दिया गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल की आवाजाही लगभग पूरी तरह से ठप हो चुकी है। ईरान की ओर से लगातार यह धमकियां दी जा रही हैं कि वह बिना अनुमति वाले तेल टैंकरों पर हमला करेगा। इन तमाम दबावों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही संकट में है और अब विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ईरान को पूरी तरह घेरने के लिए अंतिम विकल्पों पर काम कर रहा है।
चीन की टीपॉट रिफाइनरियों पर नजर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन बना हुआ है। केप्लर फर्म के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक ईरान का 80 प्रतिशत से अधिक तेल चीन द्वारा ही खरीदा जाता है। इस व्यापार में चीन की छोटी और स्वतंत्र रिफाइनरियां जिन्हें टीपॉट कहा जाता है उनकी भूमिका बहुत बड़ी है। ये रिफाइनरियां चीन की कुल रिफाइनरी क्षमता का लगभग एक चौथाई हिस्सा हैं और बहुत कम मुनाफे पर अपना संचालन करती हैं। चूंकि इन छोटी रिफाइनरियों का अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से कोई सीधा संबंध नहीं होता इसलिए इन पर अमेरिकी प्रतिबंधों का प्रभाव कम पड़ता था। अब अमेरिका इन रिफाइनरियों पर भी शिकंजा कसने की तैयारी कर रहा है ताकि ईरान के तेल बाजार को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।
बड़े चीनी बैंकों को सख्त चेतावनी
ओएफएसी ने पहले ही चीन और हांगकांग की उन छोटी संस्थाओं पर द्वितीयक प्रतिबंध लगा दिए हैं जो ईरान के तेल के पैसे के लेनदेन या हथियारों की खरीद में संलिप्त थीं। अब ट्रेजरी विभाग ने चीन के दो सबसे बड़े बैंकों को भी कड़ी चेतावनी दी है। अमेरिका ने साफ कर दिया है कि यदि उनके सिस्टम के माध्यम से ईरानी फंड का कोई भी लेनदेन पाया गया तो उन्हें भी ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन बड़े बैंकों पर कार्रवाई होती है तो यह वैश्विक वित्तीय संस्थानों के लिए एक बहुत बड़ा झटका होगा। हालांकि अमेरिका इस दिशा में सावधानी से कदम बढ़ा रहा है क्योंकि उसे डर है कि चीन इसके जवाब में भविष्य की तकनीक के लिए आवश्यक खनिजों के निर्यात को रोक सकता है और इसी वर्ष 24 सितंबर को वाशिंगटन के व्हाइट हाउस में ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात भी प्रस्तावित है इसलिए अमेरिकी अधिकारी तनाव को संतुलित करने का प्रयास भी कर रहे हैं।
फर्जी कंपनियों और हवाई व्यापार पर प्रहार
ईरान अक्सर प्रतिबंधों से बचने के लिए नई और फर्जी कंपनियों का सहारा लेता है। अमेरिका अब चीन और खाड़ी देशों में सक्रिय उन सभी व्यक्तियों और संस्थाओं को लक्षित कर रहा है जो ईरान को युद्ध के लिए धन जुटाने में मदद करते हैं। ट्रेजरी विभाग ने हाल ही में ऐसी कई कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए हैं जो ईरान के तेल राजस्व को आयात के लिए उपयोग करने में सहायता कर रही थीं। ओब्सीडियन रिस्क एडवाइजर्स के ब्रेट एरिकसन इसे व्हैक ए मोल खेल की तरह देखते हैं क्योंकि ईरान एक कंपनी बंद होने पर तुरंत दूसरी कंपनी खड़ी कर लेता है। वहीं फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के विशेषज्ञ मियाद मालेकी का मानना है कि स्कॉट बेसेंट का मुख्य उद्देश्य तेल भेजने वालों, खरीदारों और मुद्रा बदलने वालों पर सख्ती करना है। समुद्री नाकेबंदी के बाद अब ईरान के हवाई व्यापार को रोकने के लिए नए विमानन प्रतिबंधों की भी तैयारी है।
जमीनी नाकेबंदी और पड़ोसी देशों की भूमिका
समुद्री और हवाई मार्गों के बाद अब अमेरिका और इजरायल के अधिकारी ईरान की जमीनी नाकेबंदी पर विचार कर रहे हैं और इस योजना को सफल बनाने के लिए इराक, तुर्की, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान और आर्मेनिया जैसे पड़ोसी देशों का सहयोग आवश्यक होगा। अफगानिस्तान की कठिन भौगोलिक सीमाओं को छोड़कर अन्य देशों के साथ ट्रंप प्रशासन के संबंध काफी हद तक स्थिर हैं। ट्रंप के पास पाकिस्तान पर काफी कूटनीतिक दबाव है क्योंकि पाकिस्तान ट्रेजरी से 10 अरब डॉलर का करेंसी स्वैप मांग रहा है। इसी तरह तुर्की भी अमेरिकी एफ 35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम में वापस आना चाहता है। यदि यह जमीनी नाकेबंदी प्रभावी होती है तो ईरान में भोजन, ऊर्जा और कपड़ों का आयात पूरी तरह से रुक सकता है और हालांकि विशेषज्ञ इसे जमीन पर लागू करना एक बड़ी चुनौती मानते हैं।
व्यापारिक देशों पर नए टैरिफ का खतरा
इन सभी उपायों के अलावा डोनाल्ड ट्रंप उन देशों पर भारी आयात शुल्क यानी टैरिफ लगाने की धमकी दे रहे हैं जो ईरान के साथ व्यापार जारी रखते हैं। हालांकि पूर्व में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे टैक्स के कानूनी आधार को खारिज किया था लेकिन पिछले सप्ताह अमेरिकी सीनेट ने एक नया रूस प्रतिबंध बिल पारित किया है जिसमें ईरान पर नए प्रतिबंधों का भी प्रावधान है। यह बिल ट्रंप को उन देशों पर टैरिफ लगाने की नई कानूनी शक्ति प्रदान कर सकता है जो ईरान के व्यापार या हथियारों की खरीद में सहायक हैं। हालांकि इस बिल को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित होना शेष है जो कि एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा क्योंकि डेमोक्रेट्स और कुछ रिपब्लिकन नेता इन टैरिफ के आर्थिक परिणामों को लेकर चिंतित हैं।
