यूजीसी विवाद पर धर्मेंद्र प्रधान का बड़ा बयान, सुप्रीम कोर्ट पहुंची जंग

यूजीसी के नए नियमों पर मचे घमासान के बीच शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्पष्ट किया है कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में इन नियमों की परिभाषा को चुनौती दी गई है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर देश के शैक्षणिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। इस विवाद के केंद्र में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा और उसके दायरे को रखा गया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए छात्रों और शिक्षण संस्थानों को भरोसा दिलाया है कि सरकार किसी भी स्तर पर भेदभाव को बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि नियमों का उद्देश्य सुरक्षा प्रदान करना है, न कि उत्पीड़न का जरिया बनना।

धर्मेंद्र प्रधान का बड़ा आश्वासन

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एक सार्वजनिक बयान में कहा कि यूजीसी के नए रेगुलेशन को लेकर जो भी आशंकाएं जताई जा रही हैं, वे निराधार हैं। उन्होंने कहा, मैं सभी को भरोसा दिलाता हूं कि किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा। कानून का इस्तेमाल केवल न्याय सुनिश्चित करने के लिए किया जाएगा और किसी भी छात्र या कर्मचारी का उत्पीड़न नहीं होने दिया जाएगा और न ही किसी को इन नियमों का गलत फायदा उठाने की अनुमति मिलेगी। मंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब कई छात्र संगठन और विशेषज्ञ इन नियमों की व्याख्या को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में कानूनी चुनौती

शिक्षा मंत्री के आश्वासनों के बावजूद, यह मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुंच गया है और सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें यूजीसी के नए नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यूजीसी ने जाति-आधारित भेदभाव की जो परिभाषा अपनाई है, वह 'गैर-समावेशी' है। याचिका में कहा गया है कि नियमों के मौजूदा स्वरूप में केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग। (OBC) को ही सुरक्षा के दायरे में रखा गया है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को इससे बाहर कर दिया गया है।

संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन

याचिका में विस्तार से बताया गया है कि यूजीसी के ये नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1) और 21 का उल्लंघन करते हैं और अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 15(1) धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जाति-आधारित उत्पीड़न किसी के साथ भी हो सकता है, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो और सामान्य वर्ग के छात्रों को शिकायत निवारण तंत्र से बाहर रखना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। इसके अलावा, अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने के अधिकार का भी हवाला दिया गया है।

संस्थागत सुरक्षा और भेदभाव का दायरा

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि जाति-आधारित भेदभाव को 'जाति-तटस्थ' (Caste-Neutral) बनाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यदि किसी सामान्य वर्ग के छात्र को उसकी जाति की पहचान के कारण प्रताड़ित। किया जाता है, तो नए नियमों के तहत उसके पास शिकायत दर्ज कराने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। यूजीसी ने अपनी गाइडलाइंस में भेदभाव को सख्ती से आरक्षित श्रेणियों तक सीमित कर दिया है, जिससे एक बड़ा वर्ग असुरक्षित महसूस कर रहा है। याचिका में मांग की गई है कि 'समान अवसर केंद्र' और 'समानता हेल्पलाइन'। जैसी सुविधाएं बिना किसी भेदभाव के सभी छात्रों के लिए उपलब्ध होनी चाहिए।

आगे की राह और छात्रों की मांग

अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि वह यूजीसी को नियम 3(सी) में संशोधन करने का निर्देश देता है या नहीं। छात्र संगठनों का एक धड़ा मांग कर रहा है कि कैंपस में समावेशी माहौल बनाने के लिए नियमों को और अधिक व्यापक बनाया जाए। शिक्षा मंत्रालय ने भी संकेत दिए हैं कि वे कोर्ट की। टिप्पणियों और छात्रों के फीडबैक पर विचार करने के लिए तैयार हैं। फिलहाल, धर्मेंद्र प्रधान के बयान ने कुछ हद तक स्थिति को शांत। करने की कोशिश की है, लेकिन कानूनी लड़ाई अभी लंबी खिंच सकती है।

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