ईरान पर हमले के लिए अमेरिका ने बोला झूठ, 5 अधिकारियों का खुलासा

ईरान पर हमले के दौरान डोनाल्ड ट्रंप के परमाणु दावों को पांच अंतरराष्ट्रीय अधिकारियों ने गलत बताया है। इनमें अमेरिकी खुफिया प्रमुख तुलसी गबार्ड और ओमान के विदेश मंत्री शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान परमाणु हथियार नहीं बना रहा था और समझौते के करीब था, लेकिन इजराइल के प्रभाव में हमला किया गया।

ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच एक बड़ा खुलासा हुआ है। ईरान पर हमले के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दिए गए बयानों को दुनिया के पांच शीर्ष अधिकारियों ने गलत करार दिया है। ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान 2025 के हमले के बाद भी परमाणु हथियार विकसित कर रहा था और क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सैन्य कार्रवाई आवश्यक थी। हालांकि, अब सामने आए तथ्यों और अधिकारियों के बयानों ने इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन अधिकारियों में दो अमेरिका के हैं, जबकि अन्य ब्रिटेन, ओमान और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) से जुड़े हैं।

तुलसी गबार्ड की सीनेट में गवाही

अमेरिकी खुफिया एजेंसी की प्रमुख तुलसी गबार्ड ने बुधवार 18 मार्च को सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी के समक्ष महत्वपूर्ण गवाही दी। गबार्ड के अनुसार, जून 2025 में हुए हमले के बाद ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से पंगु हो गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके बाद ईरान ने परमाणु हथियार बनाने का कोई नया प्रयास नहीं किया। इस खुलासे के बाद सीनेट में काफी हंगामा हुआ और सांसदों ने खुफिया जानकारी को समय पर साझा न करने को लेकर सवाल उठाए। गबार्ड के इस बयान ने ट्रंप प्रशासन के उस तर्क को कमजोर कर दिया है जिसमें ईरान को तत्काल परमाणु खतरा बताया गया था।

ओमान के विदेश मंत्री का बड़ा दावा

ओमान के विदेश मंत्री बदर बिन हमद बुसैदी ने 'द इकॉनोमिस्ट' में लिखे एक लेख में अमेरिका की विदेश नीति पर गंभीर आरोप लगाए हैं। बुसैदी, जो अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता कर रहे थे, ने खुलासा किया कि दोनों देशों के बीच एक समझौता लगभग तय हो चुका था। ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन को कम करने के लिए सहमत हो गया था। बुसैदी के अनुसार, इस समझौते के बावजूद इजराइल के दबाव में अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया और उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी विदेश नीति पर वर्तमान प्रशासन का नियंत्रण कम होता दिख रहा है और निर्णय बाहरी प्रभाव में लिए जा रहे हैं।

IAEA प्रमुख रॉफेल ग्रॉसी का रुख

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के प्रमुख रॉफेल ग्रॉसी ने भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम की स्थिति स्पष्ट की है। ग्रॉसी के आधिकारिक बयानों के अनुसार, ईरान उस समय किसी भी सक्रिय परमाणु हथियार कार्यक्रम में शामिल नहीं था और एजेंसी की निगरानी रिपोर्टों ने संकेत दिया था कि ईरान तकनीकी रूप से इतनी जल्दी परमाणु बम बनाने की स्थिति में नहीं था जैसा कि दावा किया गया था। ग्रॉसी का यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रंप प्रशासन के दावों की विश्वसनीयता को चुनौती देता है, क्योंकि IAEA परमाणु गतिविधियों की निगरानी करने वाली सर्वोच्च वैश्विक संस्था है।

ब्रिटिश एनएसए जोनाथन पॉवेल की जानकारी

ब्रिटेन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) जोनाथन पॉवेल ने भी इस मामले में चौंकाने वाली जानकारी साझा की है। 'द गार्जियन' की रिपोर्ट के अनुसार, पॉवेल ईरान के साथ चल रही कूटनीतिक बातचीत का हिस्सा थे। उन्हें दी गई अंतिम ब्रीफिंग में बताया गया था कि ईरान यूरेनियम हटाने के लिए तैयार है और समझौता अंतिम चरण में है और पॉवेल ने कहा कि इस कूटनीतिक प्रगति के ठीक दो दिन बाद अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए हमले ने उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया। उनके अनुसार, कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं को सैन्य कार्रवाई के जरिए समाप्त कर दिया गया।

जोए केंट का इस्तीफा और आरोप

अमेरिकी खुफिया अधिकारी जोए केंट ने ईरान के खिलाफ युद्ध के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। केंट, जो आतंकवाद-विरोधी केंद्र के निदेशक के रूप में कार्यरत थे, ने अपने त्याग पत्र में लिखा कि ईरान से अमेरिका को कोई तत्काल खतरा नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति ने इजराइल के प्रभाव में आकर यह सैन्य कदम उठाया है। केंट की नियुक्ति स्वयं ट्रंप प्रशासन द्वारा की गई थी, इसलिए उनके इस्तीफे और आरोपों ने वाशिंगटन के राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि खुफिया इनपुट सैन्य कार्रवाई के पक्ष में नहीं थे।