अमेरिका-ईरान वार्ता विफल: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ट्रंप का प्रस्ताव 15 देशों ने ठुकराया

इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे चली मैराथन वार्ता बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई है। इसी बीच, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा के लिए डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित 15 देशों के सैन्य गठबंधन को वैश्विक स्तर पर समर्थन नहीं मिला है।

मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने के कूटनीतिक प्रयासों को उस समय बड़ा झटका लगा जब पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच आयोजित उच्च स्तरीय वार्ता बेनतीजा समाप्त हो गई। अधिकारियों के अनुसार, यह मैराथन बातचीत लगभग 21 घंटे तक चली, जिसमें दोनों पक्षों ने संघर्ष विराम की संभावनाओं पर चर्चा की। हालांकि, प्रमुख मुद्दों पर सहमति न बन पाने के कारण वार्ता को बीच में ही रोकना पड़ा। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस प्रक्रिया के बीच में ही स्वदेश लौट गए, जो वार्ता की विफलता का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।

इस्लामाबाद वार्ता का घटनाक्रम और विफलता के कारण

इस्लामाबाद में हुई इस बैठक में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों ने क्षेत्रीय सुरक्षा और युद्धविराम की शर्तों पर विस्तार से चर्चा की और ईरानी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, अमेरिका ने बातचीत के दौरान ऐसी शर्तें रखीं जिन्हें स्वीकार करना तेहरान के लिए संभव नहीं था। ईरान का आरोप है कि अमेरिकी पक्ष ने बार-बार अपने रुख में बदलाव किया, जिससे बातचीत की प्रक्रिया जटिल हो गई। दूसरी ओर, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्पष्ट किया कि तेहरान ने शांति के लिए प्रस्तावित शर्तों को मानने से इनकार कर दिया, जिसके कारण उन्हें वार्ता छोड़कर वापस लौटना पड़ा।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ट्रंप की कूटनीतिक विफलता

क्षेत्रीय तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जलमार्ग को सुरक्षित करने के लिए एक बहुराष्ट्रीय नौसैनिक गठबंधन बनाने का प्रस्ताव रखा था। ट्रंप ने दुनिया के 15 प्रमुख देशों से इस गठबंधन में शामिल होने और सैन्य सहयोग देने की अपील की थी। हालांकि, इस पहल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। ब्रिटेन, इटली, स्पेन, जापान, नॉर्वे, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देशों ने इस गठबंधन का हिस्सा बनने से औपचारिक रूप से इनकार कर दिया है। इन देशों के इस रुख ने समुद्री सुरक्षा को लेकर ट्रंप की रणनीतिक योजना को अधर में लटका दिया है।

वैश्विक शक्तियों का रुख और हिचकिचाहट

ट्रंप के प्रस्ताव पर फ्रांस ने भी पूरी तरह से सहमति नहीं जताई और वह इस मुद्दे पर हिचकिचाहट दिखाता नजर आया। चीन और नीदरलैंड जैसे देशों ने इस प्रस्ताव पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है, जबकि दक्षिण कोरिया की ओर से भी अभी तक किसी ठोस भागीदारी की पुष्टि नहीं की गई है। राजनयिक सूत्रों के अनुसार, अधिकांश देश इस संवेदनशील क्षेत्र में सीधे सैन्य भागीदारी से बच रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे ईरान के साथ तनाव और अधिक बढ़ सकता है।

हिजबुल्ला के हमले और इजरायल की चुप्पी

वार्ता की विफलता के बीच हिजबुल्ला ने इजरायली ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं। हिजबुल्ला के आधिकारिक बयानों के अनुसार, उसने अल-अलिका गैरिसन में स्थित एक महत्वपूर्ण रडार सिस्टम को ड्रोन के जरिए निशाना बनाया है। हिजबुल्ला का दावा है कि यह हमला उसकी रणनीतिक क्षमता को प्रदर्शित करता है। हालांकि, इजरायली रक्षा बलों (IDF) ने अभी तक इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है और न ही किसी बड़े नुकसान की जानकारी साझा की है। क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियां शांति की संभावनाओं को और कम कर रही हैं।

क्षेत्रीय अस्थिरता और भविष्य की अनिश्चितता

इस्लामाबाद वार्ता के टूटने और समुद्री गठबंधन को समर्थन न मिलने से मध्य पूर्व में अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, जब संवाद के रास्ते बंद होते हैं, तो सैन्य टकराव की आशंका प्रबल हो जाती है। वर्तमान में सीजफायर की उम्मीदें धूमिल नजर आ रही हैं क्योंकि दोनों पक्ष अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग पर बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ने की संभावना है।