अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर चल रही खींचतान अब एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। दोनों देशों के बीच किसी ठोस सहमति पर न पहुंच पाने की वजह से वर्तमान में लागू सीजफायर पर संकट के गहरे बादल मंडराने लगे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस स्थिति पर एक बड़ा और कड़ा बयान जारी किया है और राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि यदि परमाणु समझौते को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं होता है, तो मौजूदा सीजफायर को समाप्त किया जा सकता है। सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप फिर से युद्ध की शुरुआत करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। दूसरी ओर, ईरान ने इस तनावपूर्ण स्थिति पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान या विकल्प नहीं हो सकता और ईरान का मानना है कि उन्होंने समझौते के लिए जो प्रस्ताव पेश किया है, यदि अमेरिका उस पर सकारात्मक रूप से विचार करता है, तो बातचीत को आगे बढ़ाया जा सकता है और समाधान निकाला जा सकता है।
कतर की मध्यस्थता और बैकडोर चैनल की सक्रियता
इस जटिल कूटनीतिक गतिरोध को सुलझाने के लिए अमेरिका ने अब एक नया रास्ता अपनाया है। अमेरिका ने समझौते की संभावनाओं को तलाशने के लिए कतर को बैकडोर चैनल के माध्यम से सक्रिय किया है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कतर को जटिल डील्स और समझौतों को अंजाम देने में माहिर माना जाता है और इसी रणनीति के तहत, अमेरिका ने कतर के प्रधानमंत्री अल-थानी को इस पूरी वार्ता प्रक्रिया में शामिल किया है। कतर की भूमिका दोनों देशों के बीच एक सेतु का काम करने की है, ताकि किसी भी तरह से युद्ध की स्थिति को टाला जा सके और एक सर्वमान्य समझौते पर पहुंचा जा सके।
भरोसे की कमी और सुरक्षा गारंटी का मुद्दा
समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा दोनों देशों के बीच व्याप्त गहरे अविश्वास की है। ईरान को अमेरिका की नीतियों और वादों पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है। ईरान की संसद के स्पीकर MB गालिबफ ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए कहा है कि अमेरिका के साथ डील करना इसलिए बेहद मुश्किल है क्योंकि तेहरान को वाशिंगटन पर भरोसा नहीं है। इसी संदर्भ में, चीन में ईरान के राजदूत ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यदि दुनिया की कोई महाशक्ति इस बात की लिखित गारंटी लेती है कि भविष्य में अमेरिका ईरान पर किसी भी प्रकार का हमला नहीं करेगा, तो ईरान इस समझौते की दिशा में आगे बढ़ने के लिए तैयार हो सकता है। ईरान की मुख्य मांग यह है कि समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले उसे एक मजबूत और विश्वसनीय गारंटर मिलना चाहिए।
यूरेनियम संवर्धन और संप्रभुता का टकराव
परमाणु कार्यक्रम के तकनीकी पहलुओं पर भी दोनों पक्ष एक-दूसरे के विपरीत खड़े हैं। ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन के ठिकानों को नष्ट करने के अमेरिकी प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरान सरकार के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया है कि कोई भी समझौता केवल अमेरिका की शर्तों पर आधारित नहीं होगा। ईरान की फार्स न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को सीमित करने या खत्म करने का प्रस्ताव तो दिया है, लेकिन वह अपने रणनीतिक ठिकानों को नष्ट करने के लिए कतई तैयार नहीं है। ईरान इन ठिकानों को अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा से जोड़कर देखता है और इस पर किसी भी प्रकार का समझौता करने के पक्ष में नहीं है।
समय सीमा का विवाद और $200 अरब की क्षतिपूर्ति
समझौते की अवधि को लेकर भी दोनों देशों के बीच भारी मतभेद हैं। अमेरिका ने अपने प्रस्ताव में यह शर्त रखी थी कि ईरान को कम से कम 200 साल तक परमाणु संवर्धन से जुड़े कड़े प्रस्तावों को मानना होगा। हालांकि, ईरान ने इस लंबी अवधि को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है और वह केवल 10 साल की अवधि के लिए ही तैयार है। इसके अलावा, ईरान ने एक बड़ी वित्तीय मांग भी सामने रखी है। ईरान का कहना है कि अमेरिका ने पूर्व में उसके ठिकानों पर जो हमले किए हैं, उसके हर्जाने के तौर पर उसे कम से कम 200 अरब डॉलर की क्षतिपूर्ति राशि दी जानी चाहिए। ईरान का तर्क है कि इस राशि के बिना न्यायपूर्ण समझौता संभव नहीं है।
आंतरिक राजनीति और ट्रंप का कड़ा रुख
राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की आंतरिक राजनीतिक स्थिति पर भी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि ईरान में उदारवादी और कट्टरपंथी गुट अलग-अलग तरीके से डील करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। ट्रंप के अनुसार, उन्हें पहले बताया गया था कि ईरान 'न्यूक्लियर डस्ट' सौंप देगा, लेकिन अब वे इससे पीछे हट रहे हैं। ट्रंप ने इन लोगों को 'पागल' करार देते हुए कहा कि उनका एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार न बना सके। वहीं, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बॉल्टन का मानना है कि ईरान के कट्टरपंथी इस समझौते को लेकर बिल्कुल भी उत्सुक नहीं हैं और वे नहीं चाहते कि कोई ऐसा समझौता हो जिसे ट्रंप अपनी राजनीतिक जीत के रूप में पेश कर सकें। बॉल्टन के अनुसार, ऐसी स्थिति में ईरान पर सैन्य हमला ही ट्रंप के पास एकमात्र विकल्प बचता है।
