ईरान के लावान आइलैंड पर कब्जे की तैयारी? ट्रंप टीम का यूएई पर बड़ा दबाव

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी अधिकारी यूएई पर ईरान के रणनीतिक लावान आइलैंड पर कब्जा करने का दबाव बना रहे हैं। ईरान द्वारा दागी गई 2800 से अधिक मिसाइलों के बाद यूएई, अमेरिका और इजराइल के बीच सैन्य सहयोग काफी बढ़ गया है।

मध्य पूर्व के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पर ईरान के खिलाफ अधिक आक्रामक रुख अपनाने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी अधिकारी यह चाहते हैं कि यूएई ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण लावान आइलैंड पर कब्जा कर ले। यह प्रस्ताव ट्रंप की टीम के उन सदस्यों की ओर से आया है जो चाहते हैं कि अमेरिका के बजाय यूएई सीधे तौर पर युद्ध के मैदान में उतरे और ईरान की चुनौतियों का सामना करे। इस योजना का उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोगियों को सुरक्षा की मुख्य जिम्मेदारी सौंपना है।

लावाान आइलैंड और ट्रंप की योजना

अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यूएई को ईरान के खिलाफ आगे बढ़कर कार्रवाई करनी चाहिए। रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि अप्रैल की शुरुआत में एक गुप्त सैन्य अभियान के दौरान यूएई ने लावान आइलैंड को निशाना भी बनाया था। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पिछले 11 हफ्तों से ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच तनाव अपने चरम पर है। इस निरंतर बढ़ते संघर्ष ने पूरे मध्य पूर्व के राजनीतिक और सुरक्षा समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। ट्रंप के करीबी सूत्रों का कहना है कि क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए यूएई का सक्रिय होना अनिवार्य है और लावान आइलैंड पर नियंत्रण इस रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

ईरानी हमलों का यूएई पर प्रभाव

रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी के अंत में जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तो उसका सबसे गहरा असर यूएई पर पड़ा। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए यूएई पर 2800 से ज्यादा ड्रोन और मिसाइलें दागीं। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर हुए हमलों ने यूएई को अपनी सुरक्षा और विदेश नीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। शुरुआत में यूएई ने इस खतरे से निपटने के लिए सऊदी अरब और कतर से संपर्क किया था और उनसे ईरान के खिलाफ मिलकर जवाबी कार्रवाई करने का आग्रह किया था। हालांकि, इन दोनों देशों ने खुलकर यूएई का साथ नहीं दिया, जिसके बाद यूएई ने अमेरिका और इजराइल के साथ अपने संबंधों को और अधिक मजबूत करने का फैसला किया।

क्षेत्रीय तनाव और ओपेक से बाहर होना

ईरान के मुद्दे पर खाड़ी देशों के बीच मतभेद इतने गहरे हो गए हैं कि यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों के रिश्तों में तनाव आ गया है और इसी तनाव के बीच यूएई ने मई में पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) को छोड़ने का बड़ा फैसला लिया। माना जा रहा है कि इस फैसले के पीछे क्षेत्रीय मतभेद और सुरक्षा संबंधी चिंताएं एक बड़ी वजह हैं। पूर्व अमेरिकी राजदूत बारबरा लीफ ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ईरानी हमलों के बाद यूएई अब दुनिया को केवल दो नजरियों से देख रहा है, जिसमें एक तरफ उसके दोस्त हैं और दूसरी तरफ दुश्मन। यह विभाजन अरब जगत की पारंपरिक एकता में दरार को दर्शाता है।

इजराइल के साथ बढ़ता सैन्य सहयोग

साल 2020 में हुए अब्राहम समझौते के बाद से यूएई और इजराइल के रिश्ते लगातार प्रगाढ़ हुए हैं। वर्तमान युद्ध के दौरान इजराइल ने यूएई की सुरक्षा के लिए अपने प्रसिद्ध आयरन डोम एयर डिफेंस सिस्टम भेजे हैं ताकि ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों को प्रभावी ढंग से रोका जा सके। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने यह दावा भी किया कि उन्होंने मार्च में गुप्त रूप से यूएई का दौरा किया था, हालांकि यूएई ने आधिकारिक तौर पर इस दावे को खारिज कर दिया है और ईरान ने यूएई और इजराइल की इस बढ़ती नजदीकी पर कड़ी नाराजगी जताई है और यूएई को हमलों में शामिल देश करार दिया है। इसके जवाब में यूएई ने स्पष्ट किया है कि वह अपने खिलाफ किसी भी खतरे का जवाब देने का पूरा अधिकार रखता है।

पाकिस्तान और सऊदी अरब की भूमिका

इस युद्ध ने न केवल खाड़ी देशों बल्कि अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ भी यूएई के संबंधों को प्रभावित किया है। रिपोर्टों के अनुसार, यूएई पाकिस्तान के रुख से भी काफी नाराज है क्योंकि उसे लगता है कि पाकिस्तान ने ईरान के मामले में बहुत नरम रवैया अपनाया है। दूसरी ओर, सऊदी अरब की भूमिका भी चर्चा में है। हालांकि सऊदी अरब ने मार्च में ईरान पर कुछ हवाई हमले किए थे, लेकिन वह अभी तक यूएई, अमेरिका और इजराइल के इस नए त्रिकोणीय गठबंधन में पूरी तरह से शामिल नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया गठबंधन मध्य पूर्व की भविष्य की राजनीति को एक नई दिशा दे सकता है, जहां पुराने गुटों की जगह नए सुरक्षा समझौते ले रहे हैं।