हाल के घटनाक्रमों से संकेत मिलता है कि वेनेजुएला, जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, भारत के लिए कच्चे तेल का एक महत्वपूर्ण स्रोत फिर से बन सकता है और यदि अमेरिकी प्रतिबंध हटाए जाते हैं, तो भारत वेनेजुएला से प्रतिदिन 1 लाख से 1. 5 लाख बैरल तेल का आयात फिर से शुरू कर सकता है, और यह क्षमता बढ़कर 11. 5 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकती है। यह भारत की ऊर्जा रणनीति के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
ऐतिहासिक संबंध और आयात का पैटर्न
एक समय था जब वेनेजुएला भारत के लिए कच्चे तेल का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता था। वित्तीय वर्ष 2018 में, भारत के कुल तेल आयात में वेनेजुएला की हिस्सेदारी 6. 7% थी। रुबिक्स डेटा साइंसेज के आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2018 से वित्तीय वर्ष 2020. तक, वेनेजुएला लगातार भारत के शीर्ष छह तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा, जिसकी हिस्सेदारी 5. 9% से 6 और 7% के बीच थी। वित्तीय वर्ष 2019 में, वेनेजुएला से तेल आयात मूल्य के हिसाब से 7 और 2 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जो भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि भारत और वेनेजुएला के बीच एक मजबूत व्यापारिक संबंध। पहले से मौजूद था, जिसे भविष्य में फिर से मजबूत किया जा सकता है।
प्रतिबंधों का प्रभाव और वर्तमान स्थिति
अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण वित्तीय वर्ष 2021 के बाद से भारत के कच्चे तेल के आयात में वेनेजुएला की हिस्सेदारी तेजी से घटी। रुबिक्स के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2021 में यह हिस्सेदारी गिरकर 1 और 1% रह गई, और वित्तीय वर्ष 2022 और वित्तीय वर्ष 2023 में आयात लगभग शून्य हो गया। यह अमेरिकी प्रतिबंधों के गंभीर प्रभाव को दर्शाता है, जिनकी वजह से लेनदेन का जोखिम और लागत काफी बढ़ गई थी। हालांकि, वित्तीय वर्ष 2024 में थोड़ी राहत देखने को मिली, जब 2023 के अंत में अमेरिकी प्रतिबंधों में आंशिक ढील के बाद वेनेजुएला का हिस्सा बढ़कर 0. 6% (802 मिलियन डॉलर) हो गया। लेकिन अप्रैल से अक्टूबर की अवधि में यह फिर घटकर 0. 3% रह गया, आयात घटकर 255 मिलियन डॉलर हो गया और वेनेजुएला भारत के आपूर्तिकर्ताओं की सूची में 18वें स्थान पर खिसक गया। इससे साफ है कि भारत को होने वाली शिपमेंट एक बार फिर सीमित और रुक-रुक। कर हो रही है, जो प्रतिबंधों के पूरी तरह हटने की आवश्यकता को उजागर करती है।
कॉम्प्लेक्स रिफाइनरियों के लिए विशेष लाभ
कमोडिटी डेटा और शिप-ट्रैकिंग कंपनी केपलर के अनुसार, अगर अमेरिकी प्रतिबंध हटते हैं, तो वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल फिर से भारत के आयात में शामिल हो सकता है, जिससे खासतौर पर कॉम्प्लेक्स रिफाइनरियों को फायदा मिलेगा। रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी जैसी जटिल रिफाइनरियां भारी कच्चे तेल को अधिक उपयोगी ईंधन और पेट्रोकेमिकल्स में बदलने में सक्षम हैं। इसके विपरीत, हल्के कच्चे तेल के लिए बनी साधारण रिफाइनरियों में यह क्षमता कम होती है। वेनेजुएला का कच्चा तेल, जो अपनी भारी प्रकृति के लिए जाना जाता है, इन रिफाइनरियों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है, जिससे उन्हें उच्च मूल्य वाले उत्पादों का उत्पादन करने और अपने मुनाफे में सुधार करने में मदद मिलेगी।
भारत के लिए तेल विकल्पों का विस्तार
केपलर के मुताबिक, अगर वेनेजुएला में राजनीतिक स्थिरता आती है और नए निवेश होते हैं, तो वेनेजुएला के तेल उत्पादन में धीरे-धीरे सुधार हो सकता है। इससे भारत के लिए तेल खरीदने के विकल्प बढ़ेंगे। वर्तमान में, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कुछ प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं पर बहुत अधिक निर्भर है और वेनेजुएला से तेल की वापसी इस निर्भरता को कम करने में मदद करेगी और भारत को वैश्विक बाजार में अधिक लचीलापन प्रदान करेगी। यह भू-राजनीतिक जोखिमों को कम करने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने में भी सहायक होगा।
सौदेबाजी की ताकत और ऊर्जा सुरक्षा में वृद्धि
वेनेजुएला से तेल की खरीद में बढ़ोतरी होने पर मिडिल ईस्ट के सप्लायर्स के साथ भारत की सौदेबाजी की ताकत भी बढ़ेगी, भले ही असली खरीद कुछ ही रिफाइनरियों तक सीमित रहे। जब भारत के पास अधिक विकल्प होंगे, तो वह बेहतर शर्तों और कीमतों पर तेल खरीदने के लिए बातचीत करने की स्थिति में होगा। इसके अलावा, रूसी तेल पर चल रही जांच के बीच वेनेजुएला का कच्चा तेल भारत को एक राजनीतिक रूप से स्वीकार्य विकल्प देता है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के बड़े लक्ष्य को भी सपोर्ट करता। है, जिससे देश की ऊर्जा आपूर्ति की विश्वसनीयता और स्थिरता सुनिश्चित होती है।
रूसी तेल पर संभावित अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव
यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत पहले से ही सस्ते रूसी कच्चे तेल की खरीद पर लगने वाले भारी अमेरिकी टैरिफ का सामना कर रहा है और केपलर के अनुसार, अगर रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर प्रस्तावित 500% अमेरिकी टैरिफ लागू होते हैं, तो इससे तेल खरीदने का तरीका पूरी तरह बदल सकता है। ऐसे में, वेनेजुएला का तेल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बफर के रूप में कार्य कर सकता है, जिससे उसे अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक व्यवहार्य और राजनीतिक रूप से स्वीकार्य विकल्प मिलेगा, जिससे संभावित रूप से उच्च टैरिफ के प्रभाव को कम किया जा सकेगा।
रिफाइनरी अनुकूलता और भविष्य के निवेश
वेनेजुएला का भारी और बहुत भारी कच्चा तेल सभी भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त नहीं है। पहले भी इसकी प्रोसेसिंग ज्यादातर रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी और नायरा एनर्जी की वाडिनार रिफाइनरी में ही होती रही है। ये दोनों रिफाइनरियां ज्यादा सल्फर और भारी तेल को संभालने के लिए तैयार हैं और हालांकि, आईओसी की पारादीप रिफाइनरी, एमआरपीएल और एचपीसीएल-मित्तल एनर्जी में भी कभी-कभी सीमित मात्रा में वेनेजुएला का तेल प्रोसेस किया गया है, लेकिन फिलहाल ज्यादातर सरकारी रिफाइनरियों के पास इतने भारी और अम्लीय तेल को बड़े पैमाने पर प्रोसेस करने की पर्याप्त सुविधा नहीं है। अच्छी खबर यह है कि विशाखापत्तनम समेत कुछ अन्य रिफाइनरियों में जटिलता बढ़ाने के लिए किए जा रहे निवेश से भविष्य में वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने की भारत की क्षमता बढ़ सकती है।
हालांकि, भारतीय रिफाइनरियां मिडिल ईस्ट और अमेरिका से तेल खरीद सकती हैं, लेकिन वहां से आने वाले तेल की ढुलाई लागत ज्यादा होती है और मुनाफा कम बचता है। ऐसे में उम्मीद है कि वेनेजुएला का कच्चा तेल बाजार में छूट पर आएगा, जिससे यह उन रिफाइनरियों के लिए ज्यादा आकर्षक होगा जो इसके अनुकूल हैं। यह छूट भारत को अपनी खरीद लागत कम करने और अपनी रिफाइनरियों के लिए बेहतर मार्जिन। सुनिश्चित करने में मदद कर सकती है, जिससे यह एक आर्थिक रूप से आकर्षक विकल्प बन जाएगा।
वेनेजुएला के तेल उत्पादन में वृद्धि की संभावना
एस एंड पी ग्लोबल एनर्जी के मुताबिक, अगर प्रतिबंध हटते हैं तो वेनेजुएला का तेल उत्पादन बढ़ सकता है और लेकिन अगले 12 से 24 महीनों में उत्पादन को 15 लाख बैरल प्रतिदिन तक ले जाने के लिए कई अरब डॉलर के नए निवेश की जरूरत होगी। यह मौजूदा स्तर से करीब 5 लाख बैरल प्रतिदिन ज्यादा है। वेनेजुएला को अपनी तेल अवसंरचना को आधुनिक बनाने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण। पूंजी और तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता होगी, जिसमें भारतीय कंपनियां एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
भारतीय कंपनियों के अपस्ट्रीम निवेश का भविष्य
भारत के लिए अपस्ट्रीम हिस्सेदारी के लिहाज से भी इसके मायने अहम हैं। ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (ओवीएल) की वेनेजुएला के सैन क्रिस्टोबल ऑनशोर फील्ड में 40% हिस्सेदारी है और ओरिनोको बेल्ट के काराबोबो-1 भारी तेल प्रोजेक्ट में आईओसी और ऑयल इंडिया के साथ 11% हिस्सेदारी है। प्रतिबंधों, कम निवेश और भुगतान की दिक्कतों के कारण ये प्रोजेक्ट लंबे समय से ठीक से इस्तेमाल नहीं हो पाए हैं, जिससे डिविडेंड और बकाया भुगतान अटके हुए हैं। केपलर के अनुसार, अगर अमेरिकी निगरानी में एक स्थिर माहौल बनता है, तो इन फील्ड्स का दोबारा विकास संभव हो सकता है और इससे नकदी प्रवाह साफ होगा और बकाया रकम की वसूली हो सकेगी। हालांकि अनुबंध की शर्तों और प्रशासन को लेकर कुछ जोखिम बने रहेंगे, लेकिन वेनेजुएला को पूंजी, तकनीक और लंबे समय के खरीदारों की जरूरत है। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय कंपनियों की भागीदारी खत्म होने के बजाय बनी रह सकती है, जिससे दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग और मजबूत होगा।