पति या पत्नी की मृत्यु के बाद कौन भरेगा ITR? जानिए कानूनी उत्तराधिकारी के लिए जरूरी नियम

जीवनसाथी की मृत्यु के बाद कानूनी उत्तराधिकारी को ITR दाखिल करना होता है। नॉमिनी केवल संपत्ति का संरक्षक होता है, मालिक नहीं। समय पर रिटर्न न भरने से कानूनी परेशानियां और टैक्स नोटिस आ सकते हैं। जानिए वसीयत न होने पर क्या हैं नियम।

यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और उसने अपने पीछे कोई वसीयत नहीं छोड़ी है, तो परिवार के सदस्यों को कई तरह की कानूनी और वित्तीय उलझनों का सामना करना पड़ता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि मृतक का इनकम टैक्स रिटर्न यानी ITR कौन दाखिल करेगा। इसके साथ ही बैंक खातों या डीमैट खातों में दर्ज नॉमिनी के अधिकारों को लेकर भी अक्सर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। टैक्स विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि ऐसी स्थिति में नॉमिनी संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता है। वह केवल कानूनी उत्तराधिकारियों की ओर से एक ट्रस्टी या संरक्षक की भूमिका निभाता है और अंतिम मालिकाना हक कानूनी वारिसों का ही होता है।

नॉमिनी और कानूनी वारिस के बीच का अंतर

विशेषज्ञों के अनुसार, बैंक या डीमैट खाते में नॉमिनी का नाम होने का मुख्य उद्देश्य केवल संपत्ति के हस्तांतरण की प्रक्रिया को सरल बनाना है। इससे नॉमिनी को उस संपत्ति का अंतिम मालिक नहीं माना जा सकता। संपत्ति पर अंतिम अधिकार हमेशा कानूनी उत्तराधिकारियों का ही होता है और संपत्ति का बंटवारा संबंधित उत्तराधिकार कानून के प्रावधानों के अनुसार किया जाता है। नॉमिनी की जिम्मेदारी होती है कि वह प्राप्त संपत्ति को वास्तविक कानूनी वारिसों को सौंप दे। यही कारण है कि आयकर विभाग की प्रक्रियाओं में भी कानूनी उत्तराधिकारी को ही मृतक का प्रतिनिधि माना जाता है और उसे ही टैक्स संबंधी औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं।

कब भरना होगा मृतक का ITR?

आयकर कानून के प्रावधानों के अनुसार, यदि मृतक की आय निर्धारित बेसिक छूट सीमा से अधिक है या वह अन्य निर्धारित शर्तों को पूरा करता है, तो उसके कानूनी उत्तराधिकारी को उसकी ओर से ITR दाखिल करना अनिवार्य है। यदि मृतक ने नया टैक्स सिस्टम चुना था, तो बेसिक छूट सीमा 4 लाख रुपये है। वहीं पुराने टैक्स सिस्टम में यह सीमा व्यक्ति की उम्र के अनुसार अलग-अलग होती है। इसके अलावा, कुछ विशेष परिस्थितियों में आय कम होने के बावजूद भी ITR दाखिल करना जरूरी हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि बिजली के बिल पर 1 लाख रुपये से अधिक का खर्च किया गया हो या विदेश यात्रा पर 2 लाख रुपये से ज्यादा खर्च हुए हों, तो रिटर्न भरना अनिवार्य हो जाता है।

बिना वसीयत के क्या होगी प्रक्रिया?

यदि मृतक ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी है, तो उसकी संपत्ति उसकी मृत्यु के साथ ही लागू व्यक्तिगत उत्तराधिकार कानून के अनुसार कानूनी वारिसों में चली जाती है। ऐसी स्थिति में, वित्त वर्ष की शुरुआत यानी 1 अप्रैल से लेकर मृत्यु की तारीख तक की अवधि के लिए एक ही ITR दाखिल करना होता है। इस अवधि के बाद उस संपत्ति से होने वाली कोई भी आय संबंधित कानूनी वारिसों की आय मानी जाएगी और उस पर उन्हें अपने व्यक्तिगत रिटर्न में टैक्स देना होगा। कानूनी उत्तराधिकारी को आयकर पोर्टल पर जाकर खुद को 'कानूनी प्रतिनिधि' के रूप में पंजीकृत करना चाहिए। इसके लिए मृत्यु प्रमाण पत्र और उत्तराधिकार के प्रमाण जैसे दस्तावेजों की आवश्यकता होती है।

समय पर ITR दाखिल करना क्यों जरूरी है?

टैक्स विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मृतक के नाम पर ITR दाखिल करना जरूरी है और ऐसा नहीं किया जाता, तो भविष्य में परिवार को कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसमें आयकर विभाग से नोटिस मिलना, रिफंड मिलने में देरी होना या अन्य कानूनी पेचीदगियां शामिल हैं। इसलिए परिवार के कानूनी उत्तराधिकारी को जिम्मेदारी लेते हुए समय रहते आयकर पोर्टल पर आवश्यक प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए। सही समय पर रिटर्न दाखिल करने से न केवल कानूनी सुरक्षा मिलती है, बल्कि मृतक की वित्तीय विरासत को भी सही तरीके से व्यवस्थित किया जा सकता है।