ट्रंप को झटके से क्यों आई बाजार में तेजी, जानें पूरी रिपोर्ट और मुख्य बातें

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को लगे झटके और डेमोक्रेट्स की जीत से भारतीय शेयर बाजार में बंपर तेजी आई है। सेंसेक्स और निफ्टी में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मध्यावधि चुनाव में लगे राजनीतिक झटके ने दुनिया भर के बाजारों की तस्वीर पूरी तरह से बदल दी है और इस राजनीतिक उलटफेर का सबसे बड़ा और सकारात्मक फायदा भारतीय शेयर बाजार को मिलता हुआ दिखाई दे रहा है। अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स की बड़ी जीत के बाद डाउ जोंस तीन फीसदी उछल गया, जिसका सीधा और तेज असर भारत के घरेलू शेयर बाजार में देखने को मिला। भारतीय शेयर बाजार का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स एक हजार छह सौ से ज्यादा अंक यानी दो फीसदी की जोरदार तेजी के साथ अठहत्तर हजार नौ सौ के पार निकल गया, जबकि निफ्टी ने भी चौबीस हजार चार सौ के अहम स्तर को आसानी से पार कर लिया। अमेरिकी चुनावी नतीजों से राष्ट्रपति ट्रंप के मनमाने फैसले लेने की राजनीतिक ताकत काफी हद तक सीमित हो जाएगी। इसके साथ ही मध्य पूर्व में ईरान विवाद के सुलझने की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम और डॉलर दोनों में भारी गिरावट दर्ज की गई है और भारत के लिए विदेशी निवेश के मोर्चे से लेकर देश की महंगाई और भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीतियों तक, इन तमाम वैश्विक बदलावों के पांच बहुत बड़े और दूरगामी मायने हैं, जिन्हें समझना निवेशकों के लिए बेहद जरूरी है।

सस्ते कच्चे तेल से घटेगा भारत का सबसे बड़ा बोझ

भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी के लिए सबसे अच्छी और बड़ी खबर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट से जुड़ी है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा विवाद सुलझने की प्रबल उम्मीद से ब्रेंट क्रूड की कीमतें करीब दस फीसदी टूटकर चौरानवे डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई हैं और प्रतिष्ठित इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट डॉ वी के विजयकुमार का यह स्पष्ट मानना है कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यधिक अनुकूल माहौल बनने की वजह से भारतीय शेयर बाजार में तेजी का यह सिलसिला आगे भी लंबे समय तक लगातार जारी रहेगा। वैश्विक स्तर पर सस्ता क्रूड, शांति की मजबूत उम्मीद, देश का मजबूत आर्थिक विकास और कॉरपोरेट कंपनियों के सुधरते हुए मुनाफे ने भारत के कारोबारी माहौल को बहुत ज्यादा बेहतर कर दिया है। एमके रिसर्च के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस चालू वित्त वर्ष में अब तक भारत का तेल आयात बिल करीब चौबीस फीसदी तक बढ़ चुका है और ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें सस्ता होने से देश की खुदरा महंगाई, चालू खाते के घाटे और कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर मंडरा रहा दबाव काफी हद तक कम हो जाएगा। ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म नोमुरा का कहना है कि अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के संपन्न होने के बाद अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के भू-राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल सकते हैं। ईरान भविष्य में किसी भी समझौते के लिए कहीं अधिक लचीला और सकारात्मक रुख अपना सकता है, जिससे तेल की कीमतों में फिलहाल शामिल युद्ध के जोखिम का प्रीमियम और ज्यादा कम हो जाएगा।

कमजोर डॉलर से लौटेंगे विदेशी निवेशक

बाजार विशेषज्ञ डॉ वी के विजयकुमार ने विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई ने पिछले चार कारोबारी सत्रों के दौरान भारतीय कैश मार्केट में बीस हजार आठ सौ चौंतीस करोड़ रुपये की भारी-भरकम खरीदारी की है। भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की खरीदारी की यह रफ्तार लगातार और तेजी से बढ़ती जा रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सस्ता कच्चा तेल, दुनिया भर में कमजोर होता डॉलर और भू-राजनीतिक तनावों में कमी आने से उभरते हुए बाजारों का वैश्विक आकर्षण निवेशकों के लिए बहुत ज्यादा बढ़ गया है। लंबे समय तक लगातार बिकवाली का दौर चलाने के बाद अब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को भारतीय लार्ज-कैप शेयरों में दोबारा अपना पैसा लगाने का एक शानदार और सुनहरा मौका मिल रहा है। बाजार विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, भारतीय लार्ज-कैप शेयरों में अभी और अधिक शॉर्ट-कवरिंग देखने को मिलेगी और देश के बैंकिंग सेक्टर और फाइनेंशियल शेयरों की मजबूत अगुवाई में इन दिग्गज शेयरों में और भी बड़ी तेजी देखने को मिल सकती है। अमेरिकी चुनावी नतीजों के तुरंत बाद वैश्विक डॉलर इंडेक्स में शून्य दशमलव छह फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। दुनिया भर के निवेशकों के मन में यह बात घर कर रही है कि अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास कार्यों पर सरकारी सख्ती और निगरानी बढ़ाई जा सकती है, जिसकी वजह से अमेरिकी आर्थिक ग्रोथ की रफ्तार में कुछ सुस्ती आ सकती है। वैश्विक स्तर पर कमजोर पड़ता डॉलर हमेशा से उभरते हुए बाजारों की करेंसी और अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी राहत लेकर आता है।

ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति पर लग सकती है लगाम

अमेरिकी कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स पार्टी का नियंत्रण स्थापित होने से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक और मनमानी टैरिफ नीतियों की अब बेहद कड़ी जांच और समीक्षा होगी। ट्रंप के लिए अब अमेरिकी संसद से नए और कड़े कानून पास कराना बिल्कुल भी आसान काम नहीं रह जाएगा। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति के पास देश के व्यापार से जुड़े हुए कई बड़े और व्यापक अधिकार हमेशा सुरक्षित रहते हैं, फिर भी भविष्य में अचानक से भारी-भरकम टैरिफ बढ़ाने का गंभीर खतरा अब काफी हद तक कम हो गया है। एमके रिसर्च को पूरी उम्मीद है कि वर्ष दो हजार अट्ठारह से पहले राष्ट्रपति ट्रंप पर घरेलू स्तर पर महंगाई को नियंत्रित करने के साथ-साथ अन्य देशों के साथ बेहतर व्यापारिक समझौते करने का भारी राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ता जाएगा। भविष्य में किसी भी प्रकार के अमेरिकी टैरिफ एक्शन को एक लंबी और जटिल विधायी जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है, जिससे बाजार में अचानक से लगने वाले नीतिगत झटकों की आशंका न्यूनतम हो जाएगी। ब्रोकरेज फर्म की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लिए किसी भी प्रकार की ट्रेड डील करने की तत्काल और भारी मजबूरी अब पूरी तरह से टल गई है। हालांकि, भारतीय फार्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर पर अमेरिकी सरकार द्वारा विशेष टैरिफ लगाने का तलवार का खतरा अभी भी पूरी तरह से बना हुआ है। इसके अलावा, रूस या ईरान के साथ अमेरिका के कूटनीतिक रिश्तों में भविष्य में खटास आने का भू-राजनीतिक जोखिम भी बरकरार है। बाजार जानकारों का साफ मानना है कि ये चुनावी नतीजे अमेरिकी व्यापार नीति के तीखेपन और आक्रामकता को काफी हद तक कम जरूर करेंगे, लेकिन वैश्विक नीतिगत अनिश्चितता अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है।

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड गिरने से आरबीआई को मिलेगी राहत

अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के इन चौंकाने वाले नतीजों से देश की राजधानी वॉशिंगटन में राजनीतिक गतिरोध और मतभेद बढ़ने की गहरी आशंका पैदा हो गई है और इस राजनीतिक गतिरोध की वजह से अमेरिकी सरकार द्वारा भारी वित्तीय घाटा बढ़ाने वाले नए कानूनों को लागू करने या फिर नए टैक्स में कटौती किए जाने की संभावना काफी कम हो गई है, जिसके लिए सामान्यतः बहुत अधिक संख्या में नए ट्रेजरी बॉन्ड जारी करने पड़ते हैं। अमेरिकी चुनावी नतीजों के सामने आने के तुरंत बाद अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में साफ तौर पर बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के भारी-भरकम निवेश में संभावित सुस्ती आने की वजह से अमेरिकी इकोनॉमिक ग्रोथ और महंगाई दोनों ही मोर्चों पर नरमी देखने को मिल सकती है। इस बड़े बदलाव से अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा भविष्य में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी करने की संभावना बहुत कम हो जाएगी और यह संपूर्ण वैश्विक स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद फायदेमंद साबित होगी क्योंकि इससे घरेलू बॉन्ड यील्ड और भारतीय रुपये पर पड़ने वाला विदेशी दबाव काफी हद तक घट जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई को भी विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की कीमत बचाने के बजाय देश की घरेलू विकास दर और महंगाई नियंत्रण पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करने की कहीं अधिक प्रशासनिक और नीतिगत छूट मिल जाएगी। हालांकि, आर्थिक जानकारों का यह भी मानना है कि यह वित्तीय राहत कुछ सीमित दायरे वाली हो सकती है। यदि संयुक्त राज्य अमेरिका में खुदरा महंगाई अभी भी उच्च स्तर पर अड़ी रही, तो अमेरिकी ब्याज दरों में कोई बड़ी कटौती नहीं होगी और वे लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं। इसके साथ ही, भारत की चालू खाते की विदेशी फंडिंग से जुड़ी जरूरतें भारतीय रुपये में किसी भी तरह की अत्यधिक और बड़ी मजबूती को रोकने का काम कर सकती हैं।

एआई निवेश पर सख्ती से बदलेगी ग्लोबल मार्केट की चाल

अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स पार्टी की इस अहम जीत से संयुक्त राज्य अमेरिका के भीतर डेटा-सेंटर के भारी-भरकम निवेश पर सरकारी निगरानी और कड़ाई बढ़ने का बड़ा खतरा पैदा हो गया है। विशेष तौर पर टेक्सास, जॉर्जिया और ओहायो राज्यों में इस प्रकार की प्रशासनिक सख्ती में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हो सकती है। अमेरिका की कुल मौजूदा और प्रस्तावित डेटा सेंटर क्षमता का लगभग तैंतीस फीसदी हिस्सा अकेले इन्हीं तीनों प्रमुख राज्यों में स्थित है और इन राज्यों में बिजली और पानी की भारी खपत, स्थानीय नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर पड़ने वाले दबाव और कॉरपोरेट कंपनियों को मिलने वाली टैक्स छूट को लेकर विभिन्न स्तरों पर गंभीर चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। इस सरकारी सख्ती की वजह से अमेरिका के कुछ बड़े तकनीकी प्रोजेक्ट्स के पूरा होने में लंबी देरी हो सकती है या फिर कड़े नियमों का पूरी तरह से पालन करने की कुल लागत में भारी इजाफा हो सकता है। इसके बावजूद, इस अमेरिकी चुनाव परिणाम का यह कतई अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के भारी निवेश के पूरे दौर का अब अंत हो गया है। एमके रिसर्च फर्म का यह स्पष्ट मानना है कि ये चुनावी नतीजे बुनियादी और जमीनी खर्च पर कोई स्थायी प्रहार नहीं हैं, बल्कि यह सिर्फ शेयर बाजार के मनोवैज्ञानिक सेंटीमेंट पर एक तात्कालिक झटका है और निवेश का एक बहुत बड़ा बेस पहले से ही तैयार हो चुका है, जिसके कारण वर्ष दो हजार सत्ताईस के दौरान एआई खर्च की रफ्तार में थोड़ी सी सुस्ती देखने को मिल सकती है, लेकिन इस सेक्टर की लंबी अवधि की विकास कहानी पूरी तरह से मजबूत बनी हुई है। भारतीय शेयर बाजारों के लिए इसके बहुत ही मिले-जुले और संतुलित मायने हैं। अमेरिकी एआई निवेश में यदि किसी प्रकार की भारी गिरावट आती है, तो इससे देश के टेक्नोलॉजी सेक्टर के संपूर्ण सेंटीमेंट और वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन को कुछ हद तक नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन इस हल्की सी सुस्ती की वजह से अमेरिकी खुदरा महंगाई और वहां की ब्याज दरों में नरमी आएगी, जिससे दुनिया भर के वैश्विक निवेशक महंगे अमेरिकी टेक शेयरों से अपना पैसा निकालकर अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित और आकर्षक भारतीय आईटी सेक्टर का तेजी से रुख कर सकते हैं.

वर्तमान समय में भारतीय शेयर बाजार पूरी तरह से जश्न के मूड में नजर आ रहा है, लेकिन निवेशकों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि मध्यावधि चुनाव के ये राजनीतिक नतीजे राष्ट्रपति ट्रंप की मौजूदा नीतियों और अधिकारों को अपने आप पूरी तरह से नहीं बदल सकते हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति के पास मौजूद उनकी वीटो पावर और उनके कार्यकारी अधिकार अभी भी बहुत ज्यादा मजबूत और व्यापक बने हुए हैं। आने वाले दिनों में अमेरिका की घरेलू राजनीति में एक लंबे और तीखे राजनीतिक टकराव की गंभीर चिंताएं फिर से उभर सकती हैं। डोनाल्ड ट्रंप अपने मूल राजनीतिक स्वभाव के अनुसार एक कमजोर राष्ट्रपति की भूमिका स्वीकार करने के बजाय व्हाइट हाउस में 'मिस्टर वीटो' की आक्रामक भूमिका निभाना ज्यादा पसंद करेंगे। अमेरिका की इस राजनीतिक उठापटक के चलते देश के घरेलू संस्थागत निवेशक भी बाजार की इस जोरदार तेजी में अपनी तरफ से मुनाफावसूली कर सकते हैं, जिसकी वजह से भारतीय शेयर बाजार की मौजूदा रफ्तार में कुछ समय के लिए ठहराव आ सकता है। इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय बाजार में मिल रहा बेहद सस्ता कच्चा तेल, विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा की जा रही ताबड़तोड़ लिवाली, कमजोर होता वैश्विक डॉलर और मध्य पूर्व में शांति की बढ़ती उम्मीदों ने फिलहाल भारतीय शेयर बाजार को भविष्य में आगे बढ़ने के लिए एक अभूतपूर्व नई ताकत दे दी है।