भारत ने दुनिया भर में मखाना उत्पादन के क्षेत्र में अपनी एक अलग और मजबूत पहचान बनाई है। वैश्विक स्तर पर होने वाले कुल मखाना उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 80 से 90 प्रतिशत तक है। इस विशाल उत्पादन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका बिहार राज्य की है, जिसे मखाने का गढ़ माना जाता है। भारत से मखाना खरीदने वाले देशों की सूची में अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ब्रिटेन और नेपाल जैसे देश प्रमुखता से शामिल हैं, लेकिन इनमें अमेरिका सबसे बड़े खरीदार के रूप में उभरा है और मखाना अब केवल पूजा-पाठ, उपवास या हल्के भोजन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे अब सेहत का खजाना और एक सुपरफूड माना जाने लगा है। डॉक्टर भी अब शरीर में प्रोटीन, कैल्शियम और मैग्नीशियम की कमी को पूरा करने के लिए मखाने के सेवन की सलाह दे रहे हैं और यही कारण है कि बाजार में अब मखाने से बने कई तरह के रेडीमेड स्नैक्स उपलब्ध हैं और इसकी मांग देश के साथ-साथ विदेशों में भी तेजी से बढ़ी है।
अमेरिका क्यों बना भारतीय मखाने का सबसे बड़ा खरीदार?
अमेरिका में भारतीय मखाने की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे पांच मुख्य कारण बताए जाते हैं। पहला कारण वहां के लोगों में हेल्थ और सुपरफूड के प्रति बढ़ता रुझान है। अमेरिका में लोग अब ऐसे स्नैक्स की तलाश में रहते हैं जिनमें कैलोरी कम हो और पोषण अधिक हो। मखाना इस श्रेणी में पूरी तरह फिट बैठता है क्योंकि इसे भूनकर एक हल्के और स्वस्थ नाश्ते के रूप में खाया जा सकता है। दूसरा बड़ा कारण अमेरिका में ग्लूटेन-फ्री और प्लांट-बेस्ड डाइट का बढ़ता चलन है। वहां ग्लूटेन-मुक्त भोजन करने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है और लोग पौधों पर आधारित स्नैक्स को प्राथमिकता दे रहे हैं। मखाना इन दोनों ही जरूरतों को आसानी से पूरा करता है, जिससे इसकी मांग वहां के प्रीमियम बाजारों में बढ़ गई है।
तीसरा कारण अमेरिका में रहने वाले भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रवासियों की बड़ी संख्या है। यह समुदाय अपने पारंपरिक स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूक है, और मखाना उनकी इन दोनों अपेक्षाओं पर खरा उतरता है। चौथा कारण अमेरिका का स्नैकिंग कल्चर और रेडी-टू-ईट उत्पादों की मांग है। वहां के लोग चलते-फिरते (ऑन-द-गो) स्नैक्स खाना पसंद करते हैं, और रोस्टेड व फ्लेवर्ड मखाना इसी प्रारूप में बेचा जाता है। बेहतर पैकेजिंग और अलग-अलग फ्लेवर की उपलब्धता ने इसकी मांग को और अधिक बढ़ावा दिया है। पांचवां कारण भारत की बेहतर होती सप्लाई चेन और वैल्यू-एडेड एक्सपोर्ट है। भारत में अब मखाने की प्रोसेसिंग, ग्रेडिंग और पैकिंग के स्तर में काफी सुधार हुआ है, जिससे ब्रांडेड फ्लेवर्ड मखाने का निर्यात आसान हो गया है। हालांकि कुछ रिपोर्टों में टैरिफ जैसी चुनौतियों का जिक्र होता है, लेकिन इसके बावजूद अमेरिकी बाजार में भारतीय मखाने की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है।
बिहार: मखाना उत्पादन का वैश्विक केंद्र
बिहार को मखाने का केंद्र बनाने में वहां की प्रकृति, परंपरा और बाजार की त्रिकोणीय भूमिका रही है। बिहार का मिथिला क्षेत्र अपनी विशेष जलवायु और तालाबों की संस्कृति के लिए जाना जाता है। मखाना एक जलीय फसल है जिसके लिए तालाब, पोखर और आर्द्र भूमि की आवश्यकता होती है, जो मिथिला में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। इसके अलावा, मखाने की खेती और बीजों को इकट्ठा करने का काम काफी कठिन होता है, जिसमें पीढ़ियों का अनुभव और विशेष कौशल चाहिए होता है। बिहार के कई इलाकों में यह काम सदियों से होता आ रहा है, जिससे वहां एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार हो गया है। स्थानीय स्तर पर मखाने की सफाई, सुखाई, भूनाई, पॉपिंग और ग्रेडिंग के लिए व्यापारियों और समूहों का एक बड़ा नेटवर्क विकसित हुआ है, जो पूरी सप्लाई चेन को संभालता है।
बिहार के मखाने को मिले जीआई टैग (Geographical Indication) ने भी इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दी है, जिससे विदेशी खरीदारों का भरोसा बढ़ा है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, विश्व के कुल मखाना उत्पादन का एक बहुत बड़ा हिस्सा अकेले मिथिला क्षेत्र से आता है। पहले मखाना केवल तालाबों में उगाया जाता था, लेकिन अब तकनीक के विस्तार के साथ खेतों में मेड़ बनाकर भी इसकी खेती की जा रही है, जिससे उत्पादन क्षेत्र में और वृद्धि हुई है। भारत में वर्तमान में लगभग 1 लाख 20 हजार मीट्रिक टन मखाना बीज का उत्पादन हो रहा है, जो प्रोसेसिंग के बाद लगभग 58 हजार से 65 हजार मीट्रिक टन रह जाता है। इस कुल उत्पादन में बिहार का योगदान लगभग 90 प्रतिशत है। बिहार के अलावा झारखंड, उत्तर प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल, मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्यों में भी मखाना पैदा होता है। वहीं ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कश्मीर में भी प्रायोगिक तौर पर इसकी खेती शुरू की गई है। मखाना कारोबार को और अधिक संगठित करने के लिए भारत सरकार ने हाल ही में मखाना बोर्ड का गठन भी किया है।
