अरुणाचल में चीनी सेना से फेस ऑफ और व्यापार घाटे पर कांग्रेस का मोदी सरकार पर हमला

आईटीबीपी महानिदेशक के अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिकों के साथ फेस ऑफ के दावे पर कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सीमा तनाव, प्रधानमंत्री के गलवान बयानों और रिकॉर्ड 112 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को लेकर सरकार की चीन नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

अरुणाचल प्रदेश में भारत और चीन की सीमा पर एक बार फिर से तनाव और गतिरोध की स्थिति गहरा गई है। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस यानी आईटीबीपी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर द्वारा दिए गए एक महत्वपूर्ण बयान के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। आईटीबीपी डीजी के इस दावे के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि सरकार देश के सामने चीन के मामले में नरम रुख अपना रही है और सामरिक तथा आर्थिक मोर्चों पर पूरी तरह से विफल साबित हो रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर भारत और चीन के बीच के जटिल संबंधों और सीमा सुरक्षा के मुद्दों को राष्ट्रीय पटल के केंद्र में ला खड़ा किया है।

आईटीबीपी डीजी का अरुणाचल में फेस ऑफ का बड़ा दावा

चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों के सामान्य होने के तमाम दावों के बीच, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने एक बड़ा खुलासा किया है। गत 22 अक्टूबर को राजस्थान के अलवर में आईटीबीपी कर्मियों के एक सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए शत्रुजीत कपूर ने स्पष्ट किया कि अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना यानी फेस ऑफ हुआ है और इस तरह की चुनौतीपूर्ण स्थिति आज भी जमीन पर बनी हुई है। आईटीबीपी महानिदेशक ने सीमा पर तैनात बल की नवगठित शौर्य कमांडो बटालियन की कार्यशैली और भूमिका की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि इन विशेष कमांडो ने मौजूदा सीमा टकराव और तनाव के दौरान बेहद प्रभावी और सराहनीय भूमिका निभाई है। उनके अनुसार, आईटीबीपी की सबसे बड़ी ताकत और विशेषता अत्यधिक ऊंचाई वाले और दुर्गम क्षेत्रों में लंबे समय तक काम करने का उनका व्यापक अनुभव है और देश को इस अनूठी क्षमता को और अधिक बढ़ाने तथा मजबूत करने की सख्त आवश्यकता है।

तक्षिंग और असाफिला क्षेत्र में चीनी टेंट लगाने का गंभीर मामला

अंग्रेजी समाचार पत्र द हिंदू की एक रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों के हवाले से बेहद संवेदनशील खुलासे किए गए हैं और रिपोर्ट के मुताबिक, इस वर्ष जुलाई के अंत से अरुणाचल प्रदेश के असाफिला और तक्षिंग क्षेत्र में भारत और चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए के बीच गंभीर गतिरोध बना हुआ है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चीन की सेना ने ऊपरी सुबनसिरी जिले के तक्षिंग सर्कल में माजा कंपनी के संचालन क्षेत्र के पास बेहद ऊंचाई वाले सामरिक इलाके में अपने टेंट स्थापित कर दिए हैं। सरकारी सूत्रों का दावा है कि ये चीनी टेंट वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी से करीब 6 से 7 किलोमीटर भारतीय सीमा के अंदर लगाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई महीने में नियमित गश्त और पेट्रेलिंग के दौरान माजा के पास भारतीय और चीनी सैनिक आमने-सामने आ गए थे। शुरुआती आमने-सामने की स्थिति के बाद दोनों पक्षों के सैनिक शुरुआती दौर में पीछे लौट गए थे, लेकिन कुछ ही दिनों के अंतराल के बाद चीनी सैनिक और भी अधिक संख्या में उस क्षेत्र में वापस लौट आए और वहां पक्के टेंट गाड़ दिए और तब से लेकर अब तक इस सामरिक क्षेत्र में लगातार गतिरोध और तनाव बने रहने की बात आधिकारिक और अनौपचारिक सूत्रों द्वारा कही जा रही है।

सीमा पर सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत का दौर जारी

एक तरफ जहां सीमा पर जमीन पर सैनिकों के बीच फेस ऑफ और तनाव की स्थिति बनी हुई है, वहीं दूसरी तरफ भारत और चीन के बीच इस सीमा विवाद को सुलझाने के लिए सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के प्रयास भी निरंतर जारी हैं। इसी कड़ी में, इस साल 6 अगस्त को भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श एवं समन्वय के लिए कार्य तंत्र यानी डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी। इसके कुछ ही हफ्तों बाद, 26 अगस्त को बीजिंग शहर में भारत और चीन के सीमा विवाद को लेकर विशेष प्रतिनिधियों के 25वें दौर की उच्चस्तरीय वार्ता संपन्न हुई। इस विशेष वार्ता में भारत की तरफ से देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था और भारतीय पक्ष का मजबूती से प्रतिनिधित्व किया था। इसके पश्चात, आगामी 6 सितंबर को अरुणाचल प्रदेश के वाचा-दमाई सीमा कार्मिक बैठक केंद्र पर दोनों देशों की सेनाओं के बीच पहली बार कोर कमांडर स्तर की एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई। यह उल्लेखनीय है कि पूर्वी सेक्टर के इस विशिष्ट क्षेत्र में इस तरह की द्विपक्षीय सैन्य बैठक का आयोजन पहली बार किया गया था। इससे पहले इस प्रकार की महत्वपूर्ण सैन्य और कोर कमांडर स्तर की बैठकें मुख्य रूप से पूर्वी लद्दाख क्षेत्र के चुशुल-मोल्डो सेक्टर में ही आयोजित की जाती थीं।

जयराम रमेश ने चीन नीति को लेकर सरकार को घेरा

आईटीबीपी के महानिदेशक के इस सनसनीखेज बयान के सामने आने के तुरंत बाद, कांग्रेस पार्टी के महासचिव और वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार पर जोरदार राजनीतिक हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा कि चीन के आक्रामक मामलों में लगातार केंद्र सरकार की ओर से रियायतें और ढील दी जा रही है, जबकि इसके विपरीत अरुणाचल प्रदेश के जमीनी स्तर पर चीनी सैनिकों के साथ लगातार टकराव की गंभीर स्थिति बनी हुई है। जयराम रमेश ने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि आईटीबीपी डीजी ने सीमा पर डटे भारतीय वीर जवानों के शानदार प्रदर्शन की खुले तौर पर सराहना की है, परंतु देश के प्रधानमंत्री और सरकार के किसी भी जिम्मेदार मंत्री की ओर से इस अत्यंत संवेदनशील राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कोई भी स्पष्ट सार्वजनिक प्रतिक्रिया या बयान सामने नहीं आया है। कांग्रेस नेता ने यह भी दावा किया कि सीमावर्ती क्षेत्रों के स्थानीय लोगों ने उनकी गश्त और पेट्रोलिंग के कई पारंपरिक प्वॉइंट्स तक पहुंच प्रभावित होने की गंभीर शिकायतें दर्ज कराई हैं। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम की सीधी तुलना पूर्वी लद्दाख में पूर्व में सामने आए सीमा विवादों और चीनी घुसपैठ की घटनाओं से की है।

क्षेत्रीय अखंडता और जल सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दे

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने केवल सैन्य टकराव तक ही अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि उन्होंने चीन की तरफ से अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न भौगोलिक स्थानों के नाम आधिकारिक रूप से बदलने की बार-बार की जा रही एकतरफा कोशिशों का भी कड़ा जिक्र किया। इसके अलावा, उन्होंने तिब्बत और चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाए जा रहे भारी भरकम साठ हजार मेगावाट यानी 60,000 मेगावाट की विशाल क्षमता वाली जलविद्युत बांध की खतरनाक योजना का भी पुरजोर विरोध किया। कांग्रेस नेता का स्पष्ट आरोप है कि चीन की ये तमाम सुनियोजित गतिविधियां और आक्रामक नीतियां भारत की क्षेत्रीय अखंडता, पर्यावरणीय संतुलन और भविष्य की राष्ट्रीय जल सुरक्षा के लिए अत्यंत गहरी चिंता और खतरे का बड़ा विषय हैं, जिसे सरकार नजरअंदाज कर रही है।

चीन के साथ रिकॉर्ड व्यापार घाटा और आर्थिक सुरक्षा पर संकट

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने चीन के साथ लगातार और तेजी से बढ़ते जा रहे व्यापार घाटे को भी केंद्र सरकार की विफल चीन नीति पर बड़े सवाल खड़े करने का मुख्य आधार बनाया है। 16 अरब डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर तक पहुंच गया है। इससे ठीक पिछले वित्त वर्ष में यह व्यापार घाटा लगभग 99 अरब डॉलर के आसपास दर्ज किया गया था। 63 अरब डॉलर तक जा पहुंचा था।

चीन के साथ इस भारी-भरकम व्यापारिक असंतुलन और आयात-निर्यात के अंतर को लेकर तीखा कटाक्ष करते हुए जयराम रमेश ने कहा कि चीन से लगातार बढ़ते हुए इस अंधाधुंध आयात ने देश के घरेलू उद्योगों, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई पर बहुत अधिक दबाव और संकट पैदा कर दिया है। उन्होंने केंद्र सरकार के बहुप्रचारित मेक इन इंडिया अभियान पर तंज कसते हुए कड़े शब्दों में कहा कि यह फ्लैगशिप प्रोग्राम अब पूरी तरह से इम्पोर्ट फ्रॉम चाइना यानी चीन से आयात करने की नीति में परिवर्तित हो चुका है। कांग्रेस नेता के मुताबिक, चीन के साथ इस प्रकार लगातार बढ़ता हुआ रिकॉर्ड व्यापार घाटा केवल एक साधारण आर्थिक मामला नहीं है, बल्कि यह देश की संपूर्ण आर्थिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता से जुड़ा हुआ एक अत्यंत संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व का गंभीर विषय है।

गलवान घाटी की घटना और प्रधानमंत्री के बयानों का जिक्र

अपने आक्रामक हमलों को और अधिक धार देते हुए कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने 19 जून 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए उस ऐतिहासिक और विवादित बयान का भी खुलकर हवाला दिया, जो पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय सेना के बीस वीर जवानों की शहादत के ठीक बाद देश के नाम जारी किया गया था। प्रधानमंत्री ने उस समय राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि ना तो कोई वहां हमारी सीमा में घुस आया है और ना ही कोई घुसा हुआ है, और ना ही हमारी कोई भी पोस्ट किसी दूसरे देश के अवैध कब्जे में है। जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री के उस पुराने बयान को सीधे तौर पर चीन के प्रति मौजूदा सरकार के नरम और रक्षात्मक रुख से जोड़ते हुए इसकी तीखी आलोचना की। इसके साथ ही, उन्होंने देश के पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे के कथित और संस्मरण में लिखे गए अनुभवों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि लद्दाख में चीनी घुसपैठ की शुरुआती घटनाओं के समय पूर्व सेना प्रमुख को सरकार की ओर से यह निर्देश मिला था कि जो उचित समझो वो करो, जिससे यह साफ जाहिर होता है कि सामरिक फैसलों में सरकार का रुख स्पष्ट नहीं था। इस प्रकार, आईटीबीपी डीजी के ताजा खुलासे ने एक बार फिर सीमा सुरक्षा और कूटनीति के मोर्चे पर केंद्र सरकार को विपक्ष के तीखे तीरों के केंद्र में ला खड़ा किया है, और आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों में और अधिक गरमाने की पूरी संभावना है।