India-China Trade / अमेरिकी टैरिफ से नुकसान की भरपाई, भारत ने चीन को बढ़ाया निर्यात, मोदी सरकार की नई रणनीति

अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ के कारण भारत के निर्यात में आई कमी की भरपाई चीन को निर्यात बढ़ाकर की गई है। दिसंबर के आंकड़ों के अनुसार, चीन को भारतीय निर्यात में 67.35% की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, जो इलेक्ट्रॉनिक्स और समुद्री उत्पादों जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उछाल के कारण संभव हुआ। यह मोदी सरकार की व्यापार रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है।

हाल ही में जारी वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने अपनी व्यापार रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है, जिससे वैश्विक व्यापार परिदृश्य में उसकी स्थिति मजबूत हुई है। अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50% तक टैरिफ लगाने के बाद निर्यात में आई गिरावट के बावजूद, भारत ने चीन को अपने निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि करके इस नुकसान की भरपाई कर ली है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब भारत अपने व्यापारिक संबंधों में विविधता लाने और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए नए रास्ते तलाश रहा है और मोदी सरकार की इस पहल ने उस मंजर को बदल दिया है जहां भारत अब दुनिया को सामान बेचने वाले देश चीन को भी अपना उत्पाद बेच रहा है।

विकास को गति देने वाली प्रमुख निर्यात श्रेणियां

दिसंबर महीने के व्यापार आंकड़ों ने एक स्पष्ट तस्वीर पेश की है, जिसमें चीन को भारत के निर्यात में 67. 35% की प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की गई है, जो 2. 04 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यह वृद्धि विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन, जिसे अक्सर 'दुनिया की फैक्ट्री' कहा जाता है, अब भारत से विभिन्न प्रकार के सामान खरीद रहा है। यह दर्शाता है कि भारत ने अमेरिकी बाजार में आई बाधाओं का सफलतापूर्वक सामना करते हुए एक वैकल्पिक और मजबूत बाजार में अपनी पैठ बनाई है। यह वृद्धि केवल आकस्मिक नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का परिणाम है, जहां भारत ने अपने उत्पादों की गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धात्मकता पर ध्यान केंद्रित किया है ताकि वह चीन जैसे बड़े बाजार में अपनी जगह बना सके और वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, यह वृद्धि तेल खली, समुद्री उत्पाद, दूरसंचार उपकरण और मसालों जैसे प्रमुख उत्पादों के कारण हुई है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में मजबूती का संकेत देती है। चीन को निर्यात में वृद्धि कई प्रमुख क्षेत्रों से प्रेरित है और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में, 'पॉपुलेटेड प्रिंटेड सर्किट बोर्ड' (पीसीबी), 'फ्लैट पैनल डिस्प्ले मॉड्यूल' और टेलीफोनी के लिए अन्य विद्युत उपकरण जैसे उत्पादों ने महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की है।

ये उच्च-तकनीकी घटक हैं जो चीन के विशाल विनिर्माण उद्योग के लिए आवश्यक हैं, और भारत द्वारा इनका निर्यात उसकी बढ़ती तकनीकी क्षमताओं को दर्शाता है। कृषि और समुद्री उत्पादों में भी भारत ने अपनी ताकत दिखाई है। सूखी मिर्च, ब्लैक टाइगर झींगा, मूंग, वनमेई झींगा और तेल खल अवशेष जैसे उत्पाद चीन के बाजारों में अपनी जगह बना रहे हैं और ये उत्पाद न केवल भारतीय किसानों और मछुआरों के लिए नए अवसर पैदा कर रहे हैं, बल्कि भारत की कृषि और समुद्री उत्पाद प्रसंस्करण क्षमताओं को भी उजागर करते हैं। इसके अतिरिक्त, एल्यूमीनियम और परिष्कृत तांबा सिल्लियों जैसे धातु उत्पादों ने भी निर्यात वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जो भारत के औद्योगिक आधार की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है। यह विविधीकरण भारत की निर्यात टोकरी को मजबूत कर रहा। है और उसे वैश्विक बाजार में अधिक लचीला बना रहा है।

चीन के साथ समग्र व्यापार गतिशीलता

दिसंबर में चीन से आयात भी 20% बढ़कर 11 और 7 अरब डॉलर पहुंच गया है, जो दोनों देशों के बीच व्यापार की बढ़ती मात्रा को दर्शाता है। चालू वित्तवर्ष में अप्रैल-दिसंबर अवधि के दौरान, चीन को होने वाला निर्यात 36. 7% बढ़कर 14. 24 अरब डॉलर रहा, जबकि इसी अवधि में आयात 13. 46% बढ़कर 95. 95 अरब डॉलर हो गया। इन आंकड़ों के अनुसार, पहले नौ महीनों में देश का व्यापार घाटा 81. 71 अरब डॉलर रहा। हालांकि व्यापार घाटा अभी भी काफी अधिक है, वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने निर्यात में हुई वृद्धि को 'एक स्वागत योग्य वृद्धि' बताया है और यह टिप्पणी इस बात पर जोर देती है कि निर्यात में वृद्धि एक सकारात्मक कदम है, भले ही समग्र व्यापार संतुलन अभी भी चीन के पक्ष में हो। यह दर्शाता है कि भारत अब केवल चीन से सामान खरीदने वाला देश नहीं रहा, बल्कि उसे महत्वपूर्ण उत्पाद बेचने वाला एक सक्रिय भागीदार भी बन गया है। अमेरिका के बाद चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है, और इस नए निर्यात रुझान से दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों में एक नया अध्याय शुरू हो सकता है।

अमेरिकी टैरिफ का भारतीय निर्यात पर प्रभाव

अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50% तक टैरिफ लगाए जाने के बाद, भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात में दिसंबर के दौरान 1. 83% की गिरावट दर्ज की गई, जो 6. 88 अरब डॉलर रहा। यह गिरावट सितंबर और अक्टूबर में भी देखी गई थी, जब अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव सबसे अधिक था। हालांकि, नवंबर महीने में इसमें 22 और 61% की वृद्धि दर्ज की गई थी, जो एक अस्थायी सुधार का संकेत था, लेकिन दिसंबर में फिर से गिरावट ने अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यातकों के सामने आने वाली चुनौतियों को उजागर किया। अमेरिकी टैरिफ का उद्देश्य भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में कम प्रतिस्पर्धी बनाना था,। और इन आंकड़ों से पता चलता है कि इसका कुछ हद तक प्रभाव पड़ा है। यह स्थिति भारत को अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने और केवल एक देश पर निर्भरता कम करने के लिए प्रेरित कर रही है।

अमेरिका-भारत व्यापार अवलोकन

चालू वित्तवर्ष में अप्रैल-दिसंबर अवधि के दौरान, देश का अमेरिका को निर्यात 9 और 75% बढ़कर 65. 87 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 12. 85% बढ़कर 39. 43 अरब डॉलर हो गया और ये आंकड़े दर्शाते हैं कि अमेरिका अभी भी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार बना हुआ है, लेकिन टैरिफ के कारण निर्यात वृद्धि की गति धीमी हुई है। अमेरिका के साथ व्यापार में उतार-चढ़ाव के बावजूद, भारत ने अपनी समग्र निर्यात रणनीति को समायोजित किया है ताकि वैश्विक व्यापार में अपनी स्थिति को बनाए रखा जा सके। यह दर्शाता है कि भारत केवल एक बाजार पर निर्भर रहने के बजाय, विभिन्न देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है।

व्यापार संतुलन और भविष्य की संभावनाएं

यह स्पष्ट है कि अमेरिका को निर्यात में आई गिरावट की भरपाई चीन को निर्यात बढ़ाकर पूरी तरह से हो चुकी है और यह भारत की व्यापार नीति में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है, जहां वह एक बाजार में चुनौतियों का सामना करने के लिए दूसरे बाजार में अवसरों का लाभ उठा रहा है। यह न केवल भारत की निर्यात क्षमता को मजबूत करता है, बल्कि वैश्विक व्यापार में उसकी लचीलेपन को भी प्रदर्शित करता है। मोदी सरकार की यह पहल भारत को एक अधिक आत्मनिर्भर और वैश्विक व्यापार में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। भविष्य में, भारत अपने व्यापारिक संबंधों में और अधिक विविधता लाने और विभिन्न देशों के साथ मजबूत आर्थिक साझेदारी बनाने पर ध्यान केंद्रित कर सकता है, ताकि किसी एक बाजार पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके और वैश्विक आर्थिक झटकों का बेहतर ढंग से सामना किया जा सके।