नई दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान पूरी दुनिया की नजरें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात पर टिकी हैं। यह बैठक भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकती है। गौरतलब है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग करीब 7 साल के लंबे अंतराल के बाद भारत के दौरे पर आ रहे हैं। गलवान घाटी में हुए संघर्ष के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा है, जो इस मुलाकात को और भी अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। दोनों नेताओं के बीच होने वाली इस बातचीत में सीमा विवाद, व्यापारिक असंतुलन और आर्थिक सहयोग जैसे गंभीर विषयों पर विस्तार से चर्चा होने की उम्मीद है।
सात साल बाद शी जिनपिंग का भारत आगमन
शी जिनपिंग का 7 साल बाद भारत आना कूटनीतिक नजरिए से एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। साल 2020 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर हुए तनाव के बाद से दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय संवाद लगभग पूरी तरह से बंद हो गया था। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोनों नेता मिलते रहे हैं, लेकिन एक औपचारिक द्विपक्षीय यात्रा का न होना रिश्तों में जमी बर्फ को दर्शाता था। अब 2026 के दिल्ली शिखर सम्मेलन में उनकी भागीदारी यह संकेत देती है कि दोनों पक्ष संवाद के जरिए समस्याओं का समाधान खोजने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य रिश्तों में आई कड़वाहट को कम करना और एक स्थिर कार्यप्रणाली विकसित करना हो सकता है।
एलएसी और सीमा पर शांति की बहाली
भारत और चीन के बीच बातचीत का सबसे संवेदनशील और प्राथमिक मुद्दा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिरता बनाए रखना है। भारत ने हमेशा यह रुख अपनाया है कि जब तक सीमा पर शांति और यथास्थिति बहाल नहीं होती, तब तक द्विपक्षीय संबंध सामान्य नहीं हो सकते। पिछले कुछ समय में सैन्य और राजनयिक स्तर पर हुई वार्ताओं, विशेषकर बीजिंग में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई बैठकों ने इस मुलाकात के लिए जमीन तैयार की है। दोनों नेता सीमा पर सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया को पूरा करने, सैन्य हॉटलाइन को और प्रभावी बनाने और कमांडर स्तर की बातचीत को निरंतर जारी रखने पर सहमति जता सकते हैं। सीमा पर विश्वास बहाली के नए उपायों (CBMs) पर भी चर्चा होने की प्रबल संभावना है।
112 अरब डॉलर का व्यापार घाटा और आर्थिक चुनौतियां
आर्थिक मोर्चे पर भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारत और चीन के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 151 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। हालांकि, इस व्यापार में भारत का घाटा 112 अरब डॉलर के विशाल स्तर पर है। प्रधानमंत्री मोदी इस बैठक में भारतीय उत्पादों, विशेषकर फार्मास्यूटिकल्स, आईटी और कृषि उत्पादों के लिए चीनी बाजार में बेहतर पहुंच की मांग कर सकते हैं। दूसरी ओर, चीन भारत में अपने निवेश पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने और चीनी कंपनियों के लिए कारोबारी माहौल को सुगम बनाने का मुद्दा उठा सकता है और भारत का लक्ष्य व्यापार को संतुलित करना है ताकि आर्थिक निर्भरता को कम किया जा सके।
सीधी उड़ानें, वीजा और कैलाश मानसरोवर यात्रा
दोनों देशों के बीच सामान्य जनजीवन और संपर्क को फिर से बहाल करने पर भी बातचीत हो सकती है और पिछले कुछ वर्षों से भारत और चीन के बीच सीधी उड़ानें बंद हैं, जिससे व्यापार और पर्यटन पर बुरा असर पड़ा है। इस बैठक में सीधी उड़ानों को फिर से शुरू करने और वीजा प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर चर्चा हो सकती है। इसके अलावा, हिंदू श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करने का मुद्दा भी बातचीत का हिस्सा रह सकता है। इन कदमों से न केवल लोगों के बीच संपर्क बढ़ेगा, बल्कि विश्वास बहाली में भी मदद मिलेगी।
ब्रिक्स के मंच पर सहयोग और भविष्य की दिशा
ब्रिक्स संगठन के भीतर भारत और चीन कई वैश्विक मुद्दों पर समान राय रखते हैं। दिल्ली शिखर सम्मेलन में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने, डिजिटल भुगतान प्रणाली को बढ़ावा देने और एमएसएमई (MSME) क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा और इसके अलावा, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर भी दोनों देश मिलकर काम करने की योजना बना सकते हैं। चूंकि चीन 2027 में ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालने वाला है, इसलिए इस बैठक में संगठन की भविष्य की प्राथमिकताओं और अगले साल के एजेंडे पर भी चर्चा होगी।
क्या किसी बड़े समझौते की उम्मीद है?
हालांकि अभी तक किसी बड़ी डील की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में कई संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। इसमें सीमा प्रबंधन के लिए नए प्रोटोकॉल, सामरिक आर्थिक वार्ता (Strategic Economic Dialogue) को फिर से शुरू करना और निवेश के नियमों में कुछ बदलाव शामिल हो सकते हैं। सबसे बड़ा संदेश यही होगा कि दोनों देश प्रतिस्पर्धा के बावजूद स्थिरता का रास्ता तलाश रहे हैं। रिश्तों में सावधानी भरी गर्माहट देखी जा रही है, लेकिन वास्तविक सुधार तभी माना जाएगा जब सीमा पर जमीनी स्तर पर बदलाव दिखाई देंगे।
