केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण के भीतर आय-आधारित सब-कोटा और प्राथमिकता तय करने की मांग का सुप्रीम कोर्ट में कड़ा विरोध किया है। सरकार ने अपने जवाब में स्पष्ट किया है कि भारत में आरक्षण का प्राथमिक आधार ऐतिहासिक और सामाजिक पिछड़ापन है, न कि केवल आर्थिक स्थिति। यह प्रतिक्रिया उस याचिका के जवाब में आई है जिसमें आरक्षण के भीतर एक विशेष नीति बनाने के लिए न्यायिक निर्देश देने की मांग की गई थी।
केंद्र सरकार का मुख्य तर्क
सरकार ने तर्क दिया कि SC, ST और OBC के लिए आरक्षण की व्यवस्था सदियों से चले आ रहे ऐतिहासिक अन्याय और सामाजिक बहिष्कार को दूर करने के लिए की गई है और केंद्र ने कहा कि केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर आरक्षण का निर्धारण नहीं किया जा सकता है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का सिद्धांत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होता है। यह रुख इस बात को रेखांकित करता है कि इन समुदायों के लिए आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक समानता सुनिश्चित करना है।
संवैधानिक प्रावधान और संसद का अधिकार
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि आरक्षण की सूचियों में किसी भी प्रकार का बदलाव करना पूरी तरह से संसद का अधिकार क्षेत्र है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 और अनुच्छेद 342 के तहत, SC और ST की सूचियों में संशोधन केवल संसद द्वारा पारित कानून के माध्यम से ही किया जा सकता है। अदालतों, ट्रिब्यूनल या राज्य सरकारों के पास इन सूचियों को संशोधित करने, बदलने या इनमें किसी समूह को शामिल करने या बाहर करने का कोई अधिकार नहीं है।
न्यायपालिका की भूमिका और कार्यपालिका का अधिकार
सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के माध्यम से दायर हलफनामे में केंद्र ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा नीति बनाने के लिए अदालती आदेश की मांग करना न्यायिक दायरे से बाहर है। सरकार का मानना है कि नीति निर्माण का कार्य पूरी तरह से विधायिका और कार्यपालिका का है। इसे रिट ऑफ मैंडमस के जरिए अनिवार्य नहीं किया जा सकता है। सरकार ने जोर देकर कहा कि आरक्षण जैसी जटिल सामाजिक नीतियों का निर्धारण संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत ही होना चाहिए।
याचिका का विवरण और याचिकाकर्ता
SC, ST और OBC आरक्षण के भीतर आर्थिक स्थिति यानी गरीबी के आधार पर प्राथमिकता देने की मांग वाली यह जनहित याचिका उत्तर प्रदेश के निवासी रमाशंकर प्रजापति और यमुना प्रसाद द्वारा दाखिल की गई है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि आरक्षण के भीतर एक ऐसा सब-कोटा बनाया जाए जिससे इन वर्गों के सबसे गरीब लोगों को प्राथमिकता मिल सके। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस याचिका का विरोध करते हुए इसे भारी जुर्माने के साथ खारिज करने की मांग की है, क्योंकि यह मौजूदा संवैधानिक ढांचे और संसद के अधिकारों में हस्तक्षेप करती है।
OBC और SEBC सूचियों पर स्पष्टीकरण
इसी तरह, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBCs/SEBCs) की केंद्रीय सूची के संबंध में भी सरकार ने कहा कि इसमें किसी भी प्रकार का संशोधन केवल संसद द्वारा पारित अधिनियम के माध्यम से ही संभव है और हालांकि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपनी स्वयं की पिछड़े वर्गों की सूची रख सकते हैं, लेकिन केंद्रीय स्तर पर इसमें बदलाव का अधिकार केवल संसद के पास सुरक्षित है। सरकार ने स्पष्ट किया कि आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था ऐतिहासिक और सामाजिक वास्तविकताओं पर आधारित है और इसमें किसी भी प्रकार का आय-आधारित बदलाव संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ होगा।
