ईरान और अमेरिका के बीच होने वाले संभावित अस्थाई समझौते की राह में अब एक नया और बड़ा रोड़ा अटक गया है और इजराइल द्वारा पहले से ही किए जा रहे विरोध के बाद, अब फ्रांस ने भी इस डील पर अपनी कड़ी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक ईरान के प्रॉक्सी संगठनों और मिसाइल निर्माण के मुद्दों को बातचीत की मेज पर नहीं लाया जाता, तब तक फ्रांस इस समझौते का विरोध जारी रखेगा। यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नया मोड़ ले आई है, क्योंकि फ्रांस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का एक स्थाई सदस्य है और उसकी सहमति के बिना प्रतिबंधों को हटाना लगभग असंभव है।
फ्रांस की शर्तें और वीटो की चेतावनी
फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने अपनी बात को मजबूती से रखते हुए कहा कि कोई भी समझौता तभी मान्य होगा जब फ्रांस उससे पूरी तरह संतुष्ट होगा। उन्होंने एक कड़ा बयान देते हुए कहा कि हमारे बिना संयुक्त राष्ट्र में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता है और बैरोट का मानना है कि इस डील में फ्रांस को शामिल करना अनिवार्य है और समझौते के नाम पर फ्रांस के हितों और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान को राहत देने के लिए संयुक्त राष्ट्र से प्रतिबंध हटाने का कोई भी प्रस्ताव लाया जाता है, तो फ्रांस उसका डटकर विरोध करेगा।
समाचार एजेंसी फ्राइंस्को के साथ बातचीत के दौरान बैरोट ने विस्तार से बताया कि मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने के लिए व्यापक स्तर पर बातचीत की आवश्यकता है। उनके अनुसार, जब तक अमेरिका और ईरान की वार्ता में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और उसके द्वारा प्रॉक्सी संगठनों को दिए जाने वाले समर्थन के मुद्दे शामिल नहीं होंगे, तब तक उस क्षेत्र में वास्तविक शांति नहीं आ सकती। बैरोट ने जोर देकर कहा कि इस वार्ता में फ्रांस की भागीदारी निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है। उन्होंने यह भी साफ किया कि यदि फ्रांस की शर्तें पूरी नहीं हुईं, तो वह आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र परिषद में अपने वीटो पावर का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा।
फ्रांस के विरोध का वैश्विक प्रभाव
इस समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान को यह भरोसा दिलाया था कि उसके खिलाफ लगे संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को हटा लिया जाएगा। इन प्रतिबंधों के हटने से ईरान के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार के रास्ते खुल जाते और उसे वैश्विक बैंकों से धन प्राप्त करने में आसानी होती और हालांकि, फ्रांस के कड़े रुख ने इस पूरी प्रक्रिया को संकट में डाल दिया है। चूंकि संयुक्त राष्ट्र में किसी भी एक स्थाई सदस्य का वीटो प्रस्ताव को पूरी तरह से रोक सकता है, इसलिए फ्रांस के विरोध को बेहद अहम माना जा रहा है। इसके बिना ईरान को मिलने वाली आर्थिक राहत अधर में लटक सकती है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब ईरान डील को लेकर इजराइल पहले ही कड़ा विरोध जता रहा है। लेबनान पर इजराइली हमलों के कारण स्विटजरलैंड में होने वाली शांति वार्ता पहले ही रद्द की जा चुकी है, जिसमें अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों को शामिल होना था। अब फ्रांस की नई शर्तों ने इस कूटनीतिक गतिरोध को और अधिक गहरा कर दिया है।
मिसाइल कार्यक्रम पर डोनाल्ड ट्रंप का रुख
दूसरी ओर, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के मिसाइल निर्माण पर प्रतिबंध न लगाने के फैसले का बचाव किया है। जब उनसे इस बारे में सवाल किया गया, तो उन्होंने इसे न्याय और संप्रभुता से जोड़ते हुए कहा, "यह अन्याय होगा और ईरान के पड़ोसी देशों, जैसे सऊदी अरब और तुर्की, के पास भी हथियार हैं। " ट्रंप का यह बयान दर्शाता है कि वह ईरान की सैन्य क्षमताओं को उसके पड़ोसियों के संदर्भ में देख रहे हैं।
ट्रंप ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वर्तमान में ईरान के पास कोई बैलिस्टिक मिसाइल नहीं है। उन्होंने कहा, "अगर वह उन्हें बनाना चाहता है, तो बनाए। मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं है। " ट्रंप का यह नजरिया फ्रांस की चिंताओं से बिल्कुल अलग है, जो ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देख रहा है और इन विरोधाभासी बयानों ने ईरान डील के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
