Greenland Dispute / डेनमार्क की PM की चेतावनी, 'अमेरिका ने हमला किया तो NATO खत्म', ट्रम्प के खिलाफ हुए 7 यूरोपीय देश

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई की तो NATO गठबंधन समाप्त हो जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के ग्रीनलैंड पर कब्जे के बयान के बाद फ्रांस, जर्मनी सहित 7 यूरोपीय देशों ने भी ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया है।

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा है कि यदि संयुक्त राज्य अमेरिका ने। ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश की, तो उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) सैन्य गठबंधन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। यह चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने ग्रीनलैंड को अमेरिका के नियंत्रण में लाने की बात कही थी और फ्रेडरिकसन ने सोमवार रात एक टीवी इंटरव्यू में स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका किसी NATO सदस्य देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करता है, तो NATO की पूरी संरचना और व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी, और कुछ भी शेष नहीं बचेगा। यह बयान उस समय आया है जब ग्रीनलैंड की संप्रभुता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बढ़ गया है।

यूरोपीय देशों का ग्रीनलैंड के समर्थन में एकजुट होना

डेनमार्क की प्रधानमंत्री के बयान के बाद, फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और ब्रिटेन जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों के नेताओं ने भी ग्रीनलैंड के पक्ष में अपनी आवाज उठाई है। इन नेताओं ने साफ तौर पर कहा है कि ग्रीनलैंड वहां के लोगों का है और ग्रीनलैंड तथा डेनमार्क से संबंधित किसी भी निर्णय का अधिकार केवल ग्रीनलैंड और डेनमार्क के पास ही है। यह एकजुटता अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के बयानों के खिलाफ यूरोपीय देशों की बढ़ती चिंता को दर्शाती है और यूरोपीय नेताओं ने आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा को यूरोप और पूरी दुनिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है, और इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार के एकतरफा सैन्य हस्तक्षेप का विरोध किया है।

ट्रम्प के ग्रीनलैंड पर कब्जे के बयान का संदर्भ

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रविवार को एक बयान में ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात कही थी और यह बयान तब आया जब वे वेनेजुएला पर किए गए हमले को लेकर पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। इस दौरान ट्रम्प ने कहा था कि वह 20 दिन में ग्रीनलैंड पर बात करेंगे। इससे पहले भी वह कई बार ग्रीनलैंड को अमेरिका के नियंत्रण में लाने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है और यह NATO का भी हिस्सा है। ट्रम्प ने सैन्य कार्रवाई की संभावना से भी इनकार नहीं किया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता बढ़ गई है। उनके इस बयान ने डेनमार्क और अन्य यूरोपीय देशों के बीच गहरी नाराजगी पैदा की है।

NATO सदस्यता और संप्रभुता का मुद्दा

डेनमार्क और ग्रीनलैंड, डेनमार्क साम्राज्य का अभिन्न अंग हैं। डेनमार्क साम्राज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों ही NATO के संस्थापक सदस्य देश हैं और nATO संधि के तहत, किसी एक सदस्य देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को पूरे गठबंधन के देशों पर हमला माना जाता है। यह सिद्धांत, जिसे सामूहिक रक्षा (Collective Defense) के रूप में जाना जाता है, NATO की नींव है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री का बयान इसी सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह NATO के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन होगा और गठबंधन को समाप्त कर देगा। यह स्थिति NATO के इतिहास में एक अभूतपूर्व संकट पैदा कर सकती है।

अमेरिका और डेनमार्क के बीच ऐतिहासिक संबंध

अमेरिका का डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ एक लंबा और करीबी रिश्ता रहा है। डेनमार्क NATO का संस्थापक सदस्य है, और 1951 के रक्षा समझौते ने अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य बेस रखने की अनुमति दी है। दोनों देश सुरक्षा, विज्ञान, पर्यावरण और व्यापार जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग करते रहे हैं। ग्रीनलैंड में स्थित थुले एयर बेस, अमेरिका के लिए आर्कटिक। क्षेत्र में मिसाइल चेतावनी और निगरानी के लिए महत्वपूर्ण है। यह ऐतिहासिक साझेदारी अब ट्रम्प के बयानों के कारण तनाव में आ। गई है, जिससे दोनों देशों के संबंधों में खटास आने की आशंका है।

ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री का कड़ा रुख

ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा है कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति ग्रीनलैंड को वेनेजुएला से जोड़कर सैन्य हस्तक्षेप की बात करते हैं, तो यह न केवल गलत है बल्कि उनके लोगों के प्रति अनादर भी है। नीलसन ने 4 जनवरी को एक बयान जारी कर कहा कि घबराहट या चिंता का कोई कारण नहीं है और केटी मिलर के पोस्ट से, जिसमें ग्रीनलैंड को अमेरिकी झंडे में लिपटा हुआ दिखाया गया है, इससे कुछ भी नहीं बदलता। उन्होंने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड बिकने वाला देश नहीं है और उसके भविष्य का फैसला उसके लोग ही करेंगे।

आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा का महत्व

यूरोप के कई बड़े देशों के नेताओं ने ग्रीनलैंड को लेकर एक साथ बयान। जारी कर आर्कटिक इलाके की सुरक्षा को यूरोप के लिए बहुत अहम बताया है। उन्होंने कहा है कि इस क्षेत्र की सुरक्षा का असर पूरी दुनिया की सुरक्षा पर पड़ता है। नेताओं ने यह भी बताया कि NATO पहले ही कह चुका है कि आर्कटिक क्षेत्र उसके लिए महत्वपूर्ण है, और इसी वजह से यूरोपीय देश वहां अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। आर्कटिक को सुरक्षित रखने और किसी भी खतरे को रोकने के लिए वहां ज्यादा गतिविधियां और निवेश किए जा रहे हैं। बयान में कहा गया है कि आर्कटिक की सुरक्षा सभी देशों को मिलकर करनी होगी, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के नियमों। का पालन किया जाएगा, जिनमें हर देश की आजादी, उसकी जमीन की सुरक्षा और उसकी सीमाओं का सम्मान शामिल है।

विवाद को भड़काने वाला सोशल मीडिया पोस्ट

वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई के ठीक बाद व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी स्टीफन मिलर की पत्नी। कैटी मिलर ने सोशल मीडिया पर ग्रीनलैंड का नक्शा अमेरिकी झंडे के रंग में रंगा हुआ पोस्ट किया। इस पोस्ट ने विवाद को और बढ़ा दिया। मिलर ने अपनी पोस्ट के कैप्शन में लिखा "जल्द ही" ("Soon"), जिससे ग्रीनलैंड और डेनमार्क में अमेरिकी कब्जे की आशंकाएं बढ़ गईं। यह घटनाक्रम ट्रम्प के ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने के लंबे समय से चले आ रहे प्रयासों को और बल देता है, जिसके लिए उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा, खनिज संसाधनों और आर्कटिक क्षेत्र में रूस-चीन की बढ़ती गतिविधियों का हवाला दिया है।

अमेरिका को ग्रीनलैंड से संभावित लाभ

अमेरिका ग्रीनलैंड को कई रणनीतिक कारणों से अपने नियंत्रण में लेना चाहता है। ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है, जो अमेरिका, यूरोप और रूस। के बीच सैन्य और मिसाइल निगरानी के लिए बेहद अहम है। यहां अमेरिका का थुले एयर बेस पहले से मौजूद है, जो मिसाइल चेतावनी और रूसी/चीनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए महत्वपूर्ण है और इसके अलावा, आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियां बढ़ रही हैं, और ग्रीनलैंड पर प्रभाव होने से अमेरिका इस इलाके में अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत रखना चाहता है। ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के बड़े भंडार माने जाते हैं, जिनका भविष्य में आर्थिक और तकनीकी महत्व बहुत ज्यादा है। चीन इन खनिजों का 70-90% उत्पादन नियंत्रित करता है, इसलिए अमेरिका अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, जिससे नई शिपिंग रूट्स खुल रही हैं। ग्रीनलैंड का नियंत्रण अमेरिका को इन रूटों पर प्रभुत्व और आर्कटिक क्षेत्र में रूस-चीन की बढ़त रोकने में मदद करेगा और अमेरिका ग्रीनलैंड को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की "फ्रंट लाइन" मानता है, और वहां प्रभाव बढ़ाकर वह भविष्य के संभावित खतरों को पहले ही रोकना चाहता है।

मोनरो डॉक्ट्रिन का उल्लेख

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी की गिरफ्तारी के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में मोनरो डॉक्ट्रिन का जिक्र किया। ट्रम्प ने कहा कि यह कार्रवाई अमेरिका की दो सौ साल पुरानी विदेश नीति के मुताबिक है। उन्होंने यह भी कहा कि मोनरो डॉक्ट्रिन अब पुरानी हो चुकी है और अमेरिका इससे भी आगे जाकर कार्रवाई कर रहा है। मोनरो डॉक्ट्रिन की शुरुआत साल 1823 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने की थी। इसका मकसद यूरोपीय देशों को उत्तर और दक्षिण अमेरिका के मामलों में दखल देने से रोकना था। इस नीति के तहत अमेरिका ने पूरे लैटिन अमेरिका को अपना प्रभाव क्षेत्र माना और बाद में इसका इस्तेमाल कई बार लैटिन अमेरिकी देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप को सही ठहराने के लिए किया गया। ट्रम्प द्वारा इस डॉक्ट्रिन का उल्लेख, हालांकि वेनेजुएला के संदर्भ में, उनकी विदेश नीति में एकतरफा कार्रवाई के प्रति झुकाव को दर्शाता है, जिसने ग्रीनलैंड के मामले में भी चिंताएं बढ़ा दी हैं।