होर्मुज संकट से महंगे होंगे कपड़े: फैशन इंडस्ट्री पर मंडराया बड़ा खतरा

होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव का असर अब आपकी अलमारी तक पहुंच रहा है। कच्चे तेल की कमी से पॉलिएस्टर और नायलॉन जैसे सिंथेटिक फाइबर का उत्पादन प्रभावित हो रहा है, जिससे आने वाले समय में ब्रांडेड कपड़ों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो सकती है।

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ता तनाव अब केवल कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल या हवाई ईंधन की कीमतों तक सीमित नहीं रह गया है और इस संकट का एक ऐसा पहलू भी है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है और वह है वैश्विक फैशन इंडस्ट्री पर इसका सीधा असर। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि जिस कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने का डर है, उसी से उन फाइबर का निर्माण होता है जिनसे हमारे कपड़े तैयार किए जाते हैं। यदि तेल की सप्लाई कम होती है, तो फाइबर का उत्पादन भी घट जाएगा, जिसका सीधा असर कपड़ों के शोरूम में लगी कीमतों पर देखने को मिलेगा।

आपकी अलमारी और तेल का गहरा संबंध

शायद आपको लगे कि होर्मुज के ऊपर से गुजरने वाली मिसाइलें आपकी फ्लीस जैकेट, लेगिंग्स या जूतों से भरी अलमारी से बहुत दूर हैं, लेकिन हकीकत इसके उलट है। आपकी अलमारी में मौजूद ज्यादातर कपड़े उसी तेल से बने होते हैं जिसकी कमी का सामना आज पूरी दुनिया कर रही है और तेल से ही पॉलिएस्टर, नायलॉन, स्पैन्डेक्स और अन्य सिंथेटिक फाइबर तैयार किए जाते हैं। हालांकि, पेट्रोलियम की कीमतों में बदलाव का असर सबसे पहले पेट्रोल और डीजल पर दिखता है, लेकिन धीरे-धीरे यह कपड़ों के व्यापार को भी अपनी चपेट में ले लेता है। विशेष रूप से सबसे सस्ते कपड़े, जैसे शीन (Shein) से मिलने वाली 1 डॉलर वाली टाइट्स या टेमू (Temu) से मिलने वाला 15 डॉलर वाला कोट, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।

इंडस्ट्री पर पड़ रहा है गहरा असर

फैशन इंडस्ट्री को सप्लाई करने वाली पेट्रोकेमिकल कंपनियों के लिए अब तक के हालात मिले-जुले रहे हैं। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया का लगभग 18 प्रतिशत पॉलिएस्टर यार्न बनाने वाली टोंगकुन ग्रुप कंपनी को उम्मीद है कि जून तक के छह महीनों में उसकी शुद्ध आय पिछले साल के मुकाबले तीन गुना हो जाएगी। इसका मुख्य कारण यह है कि कपड़ों की कंपनियां सप्लाई रुकने के डर से उत्पादों की कीमतें बढ़ा रही हैं, जबकि कंपनी उस कच्चे माल का उपयोग कर रही है जो तेल की कीमतें कम होने पर खरीदा गया था और चीन में पॉलिएस्टर फ्यूचर्स मार्च में 25 प्रतिशत बढ़कर लगभग चार साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं।

दूसरी ओर, हेंगली पेट्रोकेमिकल जैसी कंपनियों की स्थिति चिंताजनक है। इस साल अब तक कंपनी के शेयर लगभग एक-तिहाई गिर चुके हैं। यह कंपनी कच्चे तेल को पॉलीमर रेजिन और फाइबर में बदलती है। सप्लाई में कमी के कारण इसे अपना उत्पादन रोकना पड़ा है और अप्रैल में चीन में सिंथेटिक फाइबर का उत्पादन पिछले महीने के मुकाबले 11 प्रतिशत गिरकर 2024 के बाद के सबसे निचले स्तर पर आ गया है। टोंगकुन की स्थिति भी नाजुक बनी हुई है क्योंकि वह अपने वर्किंग कैपिटल के लिए शॉर्ट-टर्म बैंक लोन पर निर्भर है और ईरान में चल रहे टकराव से इसकी सप्लाई चेन बाधित होने का खतरा है।

रीसाइकिल प्लास्टिक और वैकल्पिक मार्ग

विशेषज्ञों का मानना है कि हालात बेहतर होने से पहले और खराब हो सकते हैं। तेल की सप्लाई में रुकावट से निपटने का सबसे अच्छा तरीका वैकल्पिक मटीरियल चेन, जैसे कि रीसाइकिल किए गए फाइबर पर निर्भरता है। इस मामले में जारा (Zara) की पेरेंट कंपनी इंडिटेक्स (Inditex SA) और एचएंडएम (H&M) जैसी कंपनियां यूनिकलो (Uniqlo) की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। जारा का लगभग सारा पॉलिएस्टर रीसाइकिल मटीरियल से आता है, जबकि यूनिकलो के आधे से भी कम फंक्शनल फैब्रिक रीसाइकिल मटीरियल से बनते हैं।

कॉटन उत्पादन और भविष्य की चुनौतियां

प्राकृतिक फाइबर जैसे कॉटन का उत्पादन भी इस संकट से अछूता नहीं है। भारत कॉटन का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है और वह फर्टिलाइजर बनाने के लिए जरूरी नेचुरल गैस और यूरिया के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। मई में कॉटन की कीमतें दो साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गईं और वैश्विक स्टॉक एक दशक के सबसे निचले स्तर पर है। टिम्बरलैंड और नॉर्थ फेस जैसे ब्रांड्स की मालिक कंपनी वीएफ कॉर्प (VF Corp) के सीएफओ पॉल वोगेल के अनुसार, मुनाफे में असली कमी मार्च 2028 तक के वित्तीय वर्ष में दिखाई देगी। यह संकट लंबे समय तक रहने की संभावना है, जो फैशन प्रेमियों की जेब पर भारी पड़ेगा।