भारत सरकार ने राज्यसभा में देश की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक तेल भंडारों की वर्तमान स्थिति पर विस्तृत जानकारी साझा की है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने एक लिखित उत्तर में स्पष्ट किया कि भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR), जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के समय सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करते हैं, वर्तमान में अपनी कुल क्षमता के लगभग दो-तिहाई हिस्से तक भरे हुए हैं और यह जानकारी ऐसे समय में आई है जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
7 प्रतिशत हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। इस उच्च निर्भरता को देखते हुए, सरकार ने आपातकालीन स्थितियों के लिए विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश), मंगलुरु (कर्नाटक) और पादुर (कर्नाटक) में भूमिगत चट्टानी गुफाओं में रणनीतिक भंडारण सुविधाएं स्थापित की हैं। इन सुविधाओं का प्रबंधन इंडियन स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व लिमिटेड (ISPRL) द्वारा किया जाता है। मंत्री ने सदन को बताया कि इन भंडारों में स्टॉक की मात्रा बाजार की स्थितियों और वास्तविक खपत के आधार पर बदलती रहती है।
रणनीतिक भंडारों की वर्तमान स्थिति और क्षमता
33 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) है। 372 मिलियन टन कच्चे तेल का स्टॉक उपलब्ध है, जो कुल स्थापित क्षमता का लगभग 64 प्रतिशत है। यह भंडार किसी भी आकस्मिक आपूर्ति संकट या अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अचानक होने वाली वृद्धि के दौरान देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक बफर के रूप में कार्य करता है और सरकार ने स्पष्ट किया कि यह एक गतिशील भंडार है, जिसका अर्थ है कि स्टॉक का स्तर घरेलू मांग और अंतरराष्ट्रीय बाजार से प्राप्त होने वाली खेपों के आधार पर समय-समय पर समायोजित किया जाता है।
कच्चे तेल के आयात पर भारी निर्भरता और वित्तीय व्यय
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है और इसकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक कच्चे तेल के आयात पर टिकी है। चालू वित्त वर्ष के पहले 11 महीनों (अप्रैल से फरवरी) के दौरान, भारत ने लगभग 226 मिलियन टन कच्चे तेल का आयात किया है। इस भारी मात्रा में आयात के लिए देश को लगभग 110 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा व्यय करना पड़ा है। 7 प्रतिशत आयात करता है। 4 अरब डॉलर खर्च किए हैं, जबकि एलपीजी (LPG) की लगभग 60 प्रतिशत मांग आयात के माध्यम से पूरी की जा रही है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और समुद्री मार्ग की चुनौतियां
भारत के ऊर्जा आयात का एक बड़ा हिस्सा रणनीतिक रूप से संवेदनशील समुद्री मार्गों से होकर गुजरता है। मंत्री ने बताया कि सऊदी अरब, इराक और यूएई जैसे प्रमुख खाड़ी देशों से आने वाला लगभग आधा कच्चा तेल 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) के रास्ते भारत पहुंचता है। एलपीजी के मामले में यह निर्भरता और भी अधिक है, जहां कुल आयात का 85-95 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से गुजरता है। प्राकृतिक गैस का भी लगभग 30 प्रतिशत आयात इसी मार्ग पर निर्भर है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों के कारण इस मार्ग पर सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ी हैं, जिससे आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने का जोखिम बना रहता है। हालांकि, रूस और अन्य क्षेत्रों से वैकल्पिक आपूर्ति के माध्यम से कच्चे तेल की स्थिति को संतुलित करने का प्रयास किया गया है।
भंडारण क्षमता विस्तार की आगामी परियोजनाएं
ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए, सरकार ने जुलाई 2021 में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार कार्यक्रम के दूसरे चरण (Phase-II) के तहत दो अतिरिक्त वाणिज्यिक-सह-रणनीतिक सुविधाओं की स्थापना को मंजूरी दी थी। 5 मिलियन टन होगी। 5 मिलियन टन की क्षमता वाली सुविधाएं शामिल हैं। मंत्री ने जानकारी दी कि पादुर में निर्माण कार्य शुरू करने के लिए 1 अक्टूबर 2025 की तिथि निर्धारित की गई है। इसके अलावा, सरकार मौजूदा भंडारों के वाणिज्यिक उपयोग को भी बढ़ावा दे रही है। इसी क्रम में, अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) और ISPRL के बीच एक समझौता हुआ है, जिसके तहत ADNOC को मंगलुरु में 750,000 टन की क्षमता वाली गुफा का उपयोग करने की अनुमति दी गई है।
आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण और वैश्विक साझेदारी
किसी एक क्षेत्र या देश पर निर्भरता कम करने के लिए भारत ने अपने कच्चे तेल के स्रोतों में व्यापक विविधता लाने की रणनीति अपनाई है। वर्तमान में, भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां (PSEs) दुनिया के 41 अलग-अलग देशों से कच्चे तेल का आयात कर रही हैं। पारंपरिक मध्य-पूर्वी आपूर्तिकर्ताओं जैसे इराक, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और कतर के अलावा, अब अमेरिका, नाइजीरिया, अंगोला, कनाडा, कोलंबिया, ब्राजील और मेक्सिको जैसे देशों से भी तेल मंगाया जा रहा है। भारत की कुल वर्तमान भंडारण क्षमता, जिसमें तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की अपनी सुविधाएं भी शामिल हैं, देश की लगभग 74 दिनों की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त मानी जाती है। सरकार का लक्ष्य भविष्य में इस क्षमता को और बढ़ाकर किसी भी वैश्विक संकट के प्रति देश को अधिक लचीला बनाना है।
