तेहरान की सड़कों पर AK-47: अमेरिका से तनाव के बीच ईरान ने आम लोगों को दी हथियारों की ट्रेनिंग

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच तेहरान में आम नागरिकों को AK-47 चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। सरकार 'जांफदा' अभियान के जरिए लोगों को युद्ध के लिए तैयार कर रही है, जिसमें मिसाइलों और भारी हथियारों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जा रहा है।

ईरान की राजधानी तेहरान में इन दिनों एक बेहद अलग और तनावपूर्ण माहौल देखने को मिल रहा है। शहर की सड़कों पर सेना की गाड़ियों की आवाजाही बढ़ गई है और आम नागरिकों को खुलेआम हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। सार्वजनिक कार्यक्रमों में मिसाइलों का प्रदर्शन अब एक सामान्य बात होती जा रही है। दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते कूटनीतिक और सैन्य तनाव के बीच ईरान यह संदेश देना चाहता है कि वह किसी भी बाहरी खतरे का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में यह संकेत दिए थे कि यदि बातचीत विफल रहती है और ईरान ने 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' पर अपना नियंत्रण कम नहीं किया, तो युद्ध की स्थिति दोबारा पैदा हो सकती है।

तेहरान की सड़कों पर सैन्य प्रदर्शन और ट्रेनिंग

ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के सदस्य अब सक्रिय रूप से आम लोगों को कलाश्निकोव जैसी असॉल्ट राइफलें चलाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। शहर में आयोजित होने वाली परेडों में सेना की गाड़ियों पर सोवियत काल की भारी मशीनगनें लगाई जा रही हैं और सैन्य शक्ति के इस प्रदर्शन की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक सामूहिक विवाह समारोह के मंच पर भी बैलिस्टिक मिसाइल सजाई गई थी। बताया गया है कि यह वही मिसाइल है जिसका उपयोग पहले इजरायल पर क्लस्टर हथियार गिराने के लिए किया गया था और विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल सैन्य अभ्यास नहीं है, बल्कि एक गहरा राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक संदेश है ताकि दुनिया को ईरान की ताकत का अहसास कराया जा सके।

ईरान की इस रणनीति के पीछे के मुख्य कारण

विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान के इस कदम के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं। पहला कारण अमेरिका को कड़ा जवाब देना है। अमेरिका ने संकेत दिए हैं कि वह जरूरत पड़ने पर ईरान के यूरेनियम भंडार पर सैन्य ताकत का इस्तेमाल कर कब्जा कर सकता है। ट्रंप ने यह भी कहा है कि उन्होंने कुर्द लड़ाकों को हथियार भेजे थे ताकि वे सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों की मदद कर सकें और ऐसे में ईरान अपनी ताकत दिखाकर अमेरिका को चेतावनी दे रहा है। दूसरा कारण देश के भीतर लोगों का मनोबल बढ़ाना है। युद्ध की आशंका और प्रतिबंधों के कारण ईरान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। बड़ी संख्या में लोगों की नौकरियां जा रही हैं, व्यापार ठप हो रहे हैं और खाने-पीने की वस्तुओं के साथ-साथ दवाओं की कीमतें भी बहुत बढ़ गई हैं। ऐसे में सरकार हथियारों के प्रदर्शन के जरिए अपने समर्थकों को एकजुट रखना चाहती है। तीसरा कारण भविष्य के विरोध प्रदर्शनों को रोकना है। इसी साल जनवरी में हुए प्रदर्शनों में 7000 से ज्यादा लोग मारे गए थे और हजारों को गिरफ्तार किया गया था। सरकार का मानना है कि कट्टर समर्थकों को हथियारबंद करने से भविष्य के विद्रोहों को दबाना आसान होगा।

'जांफदा' अभियान और बच्चों को शामिल करने पर विवाद

ईरान सरकार 'जांफदा' अभियान के जरिए लोगों से देश के लिए जान देने की अपील कर रही है। 'जांफदा' का अर्थ है 'वे लोग जो अपनी जान कुर्बान करने को तैयार हैं'। सरकारी टीवी और मोबाइल संदेशों के माध्यम से इस अभियान का प्रचार किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि लगभग 3 करोड़ लोगों ने इस अभियान में शामिल होने के लिए ऑनलाइन फॉर्म भरे हैं, हालांकि इस संख्या की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। इस बीच, बच्चों को हथियारों की ट्रेनिंग में शामिल करने पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है और कुछ समूहों ने परिवारों से 12 साल तक के लड़कों को रिवोल्यूशनरी गार्ड के पास भेजने को कहा है। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे 'युद्ध अपराध' करार दिया है। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता शिरीन एबादी ने भी बच्चों के हाथों में हथियार देने की आलोचना करते हुए इसकी तुलना बोको हराम जैसे समूहों से की है।

प्रशिक्षण की जमीनी हकीकत और जनता की राय

तेहरान में आयोजित ट्रेनिंग प्रोग्राम में पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बसीज फोर्स के सदस्य हादी खुशेह लोगों को कलाश्निकोव राइफल चलाना सिखा रहे हैं। उन्होंने बताया कि ट्रेनिंग पूरी करने वालों को 'जांफदा' कार्ड दिया जाएगा, जो उनके प्राथमिक हथियार प्रशिक्षण का प्रमाण होगा। हालांकि, ट्रेनिंग के दौरान कई लोग हथियारों को संभालने में काफी असहज दिखे। एक युवक तो राइफल की मैगजीन भी ठीक से नहीं लगा पाया। इन सबके बावजूद, तेहरान के 47 साल के अली मोफिदी जैसे कई आम नागरिक सरकार के इस कदम का समर्थन कर रहे हैं। उनका कहना है कि युद्ध जैसी स्थिति में हर नागरिक को बंदूक चलानी आनी चाहिए। उन्होंने संकल्प जताया कि वे अपनी जमीन का एक इंच भी नहीं छोड़ेंगे। फिलहाल, ईरान का यह कदम अमेरिका को चेतावनी देने और आंतरिक रूप से समर्थकों को संगठित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा नजर आता है।