वाशिंगटन और तेहरान के बीच जारी तनावपूर्ण स्थिति में एक नया मोड़ आता दिख रहा है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हाल ही में हुई शांति समझौते की बैठक का कोई ठोस परिणाम नहीं निकलने के बावजूद, अमेरिका इस संघर्ष से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहा है। वाशिंगटन से मिल रहे संकेतों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब ईरान के साथ किसी बड़े युद्ध में शामिल होने के मूड में नहीं हैं और बिना किसी औपचारिक समझौते के भी इस स्थिति से पीछे हटने की पटकथा तैयार की जा रही है।
इस्लामाबाद वार्ता की विफलता और अमेरिका का रुख
इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता से पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी थी कि यदि समझौता विफल रहा, तो तेहरान को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। हालांकि, 12 अप्रैल को वार्ता के बेनतीजा रहने के बाद भी अमेरिका की ओर से कोई सैन्य कार्रवाई नहीं की गई। द इकॉनोमिस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन को अब यह आभास हो रहा है कि सीधे हमले से अमेरिका को लाभ के बजाय नुकसान अधिक हो सकता है। इसके बजाय, अमेरिका ने अपनी रणनीति बदलते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहरी हिस्सों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर नई समुद्री रणनीति
अमेरिका ने अब एक नई घोषणा की है जिसके तहत होर्मुज से ईरान को टोल देकर ओमान की खाड़ी में प्रवेश करने वाले जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है। पहले अमेरिका इस रास्ते को खुला रखने की वकालत करता था, लेकिन अब वह खुद इसे ब्लॉक करने की दिशा में बढ़ रहा है। अधिकारियों के अनुसार, इस कदम का उद्देश्य ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाना है ताकि दुनिया के अन्य देश इस मसले पर हस्तक्षेप करें। ट्रंप इस स्थिति को एक रणनीतिक जीत के रूप में पेश करना चाहते हैं, जहां बिना युद्ध के ही ईरान को आर्थिक रूप से घेरा जा सके।
यूरेनियम संवर्धन और कूटनीतिक गतिरोध
ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौता होना वर्तमान परिस्थितियों में चुनौतीपूर्ण बना हुआ है और ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम में किसी भी बड़े बदलाव से इनकार कर दिया है और स्पष्ट किया है कि वह यूरेनियम को ईरान के भीतर ही पतला करेगा। इसके साथ ही, ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर टोल वसूली की अपनी मांग को बरकरार रखा है और 2015 के परमाणु समझौते की तुलना में किसी भी कमजोर समझौते पर हस्ताक्षर करना ट्रंप के लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है, विशेष रूप से अमेरिका में प्रस्तावित मध्यावधि चुनावों को देखते हुए।
खाड़ी देशों की सुरक्षा और पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती
मिडल ईस्ट के देशों में यह धारणा प्रबल हो रही है कि अमेरिका उन्हें सुरक्षा के मोर्चे पर अकेला छोड़ सकता है। इसी के मद्देनजर सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 13,000 पाकिस्तानी सैनिकों को रियाद बुलाया है। कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देश भी अपनी स्वतंत्र सुरक्षा व्यवस्थाएं तैयार कर रहे हैं। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, अमेरिका की कोशिश इस क्षेत्र को एक 'अधूरे युद्ध' की स्थिति में छोड़ने की है, जिससे खाड़ी के देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका से बड़े पैमाने पर हथियारों की खरीद जारी रखें।
जमीनी युद्ध से बचने की प्राथमिकता
अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के साथ युद्ध को आगे बढ़ाने का अर्थ होगा बड़े पैमाने पर जमीनी सैनिकों की तैनाती। राष्ट्रपति ट्रंप इस तरह के जोखिम से बचना चाहते हैं क्योंकि इससे अमेरिकी संसाधनों और जनहानि की संभावना अधिक है और यही कारण है कि अमेरिका अब पाकिस्तान जैसे मध्यस्थों के माध्यम से खुद को इस संघर्ष से धीरे-धीरे अलग कर रहा है। प्रशासन अब किसी भी प्रक्रिया में जल्दबाजी करने के बजाय इसे लंबे समय तक होल्ड पर रखने की रणनीति अपना रहा है, ताकि घरेलू राजनीति पर इसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
