जिनेवा में गुरुवार को होने वाली महत्वपूर्ण परमाणु वार्ता से पहले ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच कूटनीतिक और सैन्य तनाव चरम पर पहुंच गया है। ईरानी सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि वे किसी भी प्रकार के दबाव या धमकी के साये में बातचीत की मेज पर नहीं बैठेंगे। तेहरान ने स्पष्ट किया है कि केवल सम्मानजनक कूटनीति और आपसी बराबरी के आधार पर ही किसी समझौते तक पहुंचा जा सकता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब वाशिंगटन ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य उपस्थिति को दशकों के उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है।
मध्य पूर्व में अमेरिका की व्यापक सैन्य तैनाती
पेंटागन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका ने क्षेत्र में दो विमानवाहक पोत (एयरक्राफ्ट कैरियर) स्ट्राइक ग्रुप, कई युद्धपोत और उन्नत लड़ाकू विमानों की तैनाती की है। रक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस सैन्य जमावड़े का उद्देश्य ईरान को यह संदेश देना है कि यदि परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत विफल रहती है, तो सैन्य विकल्प पूरी तरह से खुले हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले भी संकेत दिया था कि यदि कूटनीति काम नहीं करती है, तो ईरान के परमाणु बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया जा सकता है। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह तैनाती 'मैक्सिमम प्रेशर' रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य ईरान को वार्ता के दौरान रियायतें देने के लिए मजबूर करना है।
ईरान की जवाबी चेतावनी और कूटनीतिक रुख
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ताओं ने ट्रंप के दावों को निराधार बताते हुए कहा है कि ईरान की रक्षा क्षमताएं किसी भी हमले का जवाब देने के लिए तैयार हैं। ईरानी सैन्य कमांडरों ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने कोई आक्रामक कदम उठाया, तो क्षेत्र में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य ठिकाने और संपत्तियां वैध निशाना होंगी। तेहरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह परमाणु हथियारों के निर्माण के बजाय शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के अपने अधिकार पर कायम है। अधिकारियों के अनुसार, ईरान वार्ता के लिए तैयार है, लेकिन वह अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।
परमाणु कार्यक्रम की वर्तमान स्थिति और IAEA की भूमिका
ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वर्तमान स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अनिश्चितता बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की रिपोर्टों के अनुसार, निरीक्षकों को कुछ संदिग्ध स्थलों तक पूर्ण पहुंच प्राप्त करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि पिछले अमेरिकी हमलों ने ईरान की परमाणु क्षमताओं को काफी नुकसान पहुंचाया है, हालांकि स्वतंत्र विशेषज्ञों और खुफिया रिपोर्टों में इस दावे की पुष्टि को लेकर मतभेद हैं। जिनेवा वार्ता का एक मुख्य एजेंडा ईरान के परमाणु संवर्धन स्तर को सीमित करना और IAEA के निरीक्षकों को अधिक निगरानी अधिकार प्रदान करना है।
क्षेत्रीय स्थिरता और खाड़ी देशों की चिंताएं
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे खाड़ी देशों में चिंता पैदा कर दी है। इन देशों को डर है कि यदि जिनेवा वार्ता विफल होती है और सैन्य संघर्ष शुरू होता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ेगा। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। राजनयिक सूत्रों के अनुसार, यदि ईरान अमेरिकी ठिकानों पर हमला करता है, तो हजारों अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, जिससे पूरा क्षेत्र एक बड़े युद्ध की चपेट में आ सकता है।
जिनेवा वार्ता के मुख्य बिंदु और चुनौतियां
जिनेवा में होने वाली इस बैठक में परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करने और ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने पर चर्चा होने की संभावना है। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वरिष्ठ राजनयिक कर रहे हैं, जिन्हें ट्रंप प्रशासन से सख्त निर्देश मिले हैं। दूसरी ओर, ईरान चाहता है कि किसी भी नए समझौते से पहले उस पर लगे प्रतिबंधों को हटाया जाए और भविष्य में समझौते से पीछे न हटने की गारंटी दी जाए। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी और हालिया सैन्य बयानबाजी इस वार्ता की सफलता में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
