नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह इन दिनों अपनी अनोखी और विवादित कार्यशैली के कारण चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं। जब से उन्होंने नेपाल की सत्ता संभाली है, उन पर राष्ट्रपति से दूरी बनाने, पारंपरिक प्रोटोकॉल की अनदेखी करने और न्यायपालिका में कथित हस्तक्षेप करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। एक रैपर से राजनेता और फिर सीधे प्रधानमंत्री पद तक का सफर तय करने वाले बालेन शाह के बारे में कहा जा रहा है कि वे देश को अपने ही नियमों के हिसाब से चला रहे हैं। उनके इस व्यवहार को नेपाल की स्थापित लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ माना जा रहा है, जिसकी विपक्षी नेताओं ने कड़ी आलोचना की है।
राष्ट्रपति से दूरी और संवैधानिक परंपराओं की अनदेखी
नेपाल के संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच निरंतर संवाद की एक पुरानी और अनिवार्य संवैधानिक परंपरा रही है और मगर प्रधानमंत्री बालेन शाह इस परंपरा की लगातार अनदेखी कर रहे हैं। पदभार संभालने के 4 महीने बीत जाने के बाद भी उन्होंने शीतल निवास, जो कि राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल का आधिकारिक आवास है, से एक निश्चित दूरी बना ली है। अब इन दोनों शीर्ष नेताओं के बीच केवल आधिकारिक समारोहों में ही मुलाकात होती है और इसके अलावा प्रधानमंत्री शाह ने राष्ट्रपति के साथ कोई भी सीधी या निजी मुलाकात नहीं की है। कैबिनेट के बड़े और महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी राष्ट्रपति तक पहुंचाने के लिए वे स्वयं जाने के बजाय मुख्य सचिव स्तर के अधिकारियों को भेजते हैं। शीतल निवास के अधिकारियों का मानना है कि यह व्यवहार लोकतंत्र की गरिमा और परंपरा का स्पष्ट उल्लंघन है। वहां के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि शपथ लेने के बाद से प्रधानमंत्री ने एक बार भी शीतल निवास जाकर शासन, नीति या देश के महत्वपूर्ण मामलों पर राष्ट्रपति से चर्चा नहीं की है।
विदेश नीति और राजनयिक प्रोटोकॉल में बदलाव
प्रधानमंत्री बालेन शाह ने नेपाल की दशकों पुरानी विदेश नीति और राजनयिक प्रोटोकॉल को भी पूरी तरह से बदल दिया है। आमतौर पर यह परंपरा रही है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद विदेशी राजदूतों से अकेले में मुलाकात की जाती है। बालेन शाह ने इस परंपरा को खारिज करते हुए सभी देशों के राजदूतों के साथ सामूहिक बैठकें करने की नई नीति अपनाई है। इस बदलाव को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज है। बुधवार को आयोजित एक सर्वदलीय बैठक के दौरान नेपाली कांग्रेस के प्रमुख गगन कुमार थापा ने महत्वपूर्ण चर्चाओं से प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति और उनके इस नए रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई। हालांकि, प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार असीम शाह ने इन मतभेदों की खबरों को खारिज किया है और कहा है कि ऐसी कोई दूरी नहीं है।
न्यायपालिका में हस्तक्षेप और जजों पर दबाव के आरोप
बालेन शाह सरकार पर सबसे गंभीर आरोप न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करने के लगे हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे वैश्विक मानवाधिकार संगठनों ने दावा किया है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के जजों पर इस्तीफे का दबाव बना रही है। विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट के 3 जजों—सपना प्रधान मल्ला, कुमार रेग्मी और हरि फुयाल—पर जबरन इस्तीफे का दबाव बनाने के आरोप लगे हैं। इसके अलावा, मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह ने नेपाल में 70 साल पुरानी उस परंपरा को तोड़ दिया है जिसके तहत सबसे वरिष्ठ जज को ही चीफ जस्टिस बनाया जाता था। चीफ जस्टिस प्रकाश मान सिंह राउत के रिटायर होने के बाद सपना प्रधान मल्ला एक्टिंग चीफ जस्टिस की जिम्मेदारी संभाल रही थीं और वरिष्ठता के नाते उनका दावा सबसे मजबूत था, लेकिन संवैधानिक परिषद ने उनकी सिफारिश नहीं की। इस पर प्रधानमंत्री का तर्क था कि नियुक्तियां केवल परंपरा के आधार पर नहीं बल्कि योग्यता के आधार पर होनी चाहिए।
युवाओं में लोकप्रियता और कड़े प्रशासनिक फैसले
तमाम विवादों और आलोचनाओं के बावजूद, प्रधानमंत्री बालेन शाह की लोकप्रियता नेपाल के युवाओं के बीच बहुत अधिक है। इसका मुख्य कारण उनके द्वारा लिए गए कुछ कड़े और बड़े फैसले हैं और सत्ता संभालते ही उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को गिरफ्तार करवाकर नेपाल की राजनीति में हलचल मचा दी थी। उन्होंने सरकारी दफ्तरों से वीआईपी कल्चर को खत्म करने के लिए नेताओं की तस्वीरें हटवा दीं और शैक्षणिक संस्थानों में छात्र राजनीति पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया। बालेन शाह पारंपरिक मीडिया के बजाय सोशल मीडिया के माध्यम से जनता से संवाद करना पसंद करते हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि वे व्यवस्था को सुधारने के लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं, जबकि विरोधी इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने वाला कदम बता रहे हैं।
