रूस तालिबान रक्षा समझौता: सोवियत काल के टैंक और हेलिकॉप्टर सुधारेगा मॉस्को

रूस और तालिबान के बीच हुए नए रक्षा समझौते के तहत मॉस्को अफगानिस्तान के सोवियत कालीन हथियारों जैसे T-55 टैंक और Mi-17 हेलिकॉप्टरों की मरम्मत करेगा।

अफगानिस्तान और रूस के बीच एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते की विस्तृत जानकारी सामने आई है जिसके तहत रूस तालिबान के सैन्य संसाधनों को आधुनिक बनाने में मदद करेगा। इस डील के शुरुआती प्रावधानों के अनुसार, रूस सबसे पहले तालिबान के पास मौजूद सभी पुराने हथियारों को दुरुस्त करने का काम करेगा। तालिबान के पास वर्तमान में सोवियत जमाने के टैंक, तोप, हेलिकॉप्टर और डिफेंस सिस्टम का बड़ा भंडार है। इस समय तालिबान का मुख्य फोकस अपने डिफेंस सिस्टम को मजबूत करने पर है और रूस के साथ यह समझौता इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

रक्षा समझौते की मुख्य बातें

अफगानिस्तान के लिए रूस के विशेष दूत जमीर काबुलोव ने इस समझौते के बारे में स्पष्ट किया है कि मॉस्को अभी तालिबान को कोई भी नया हथियार उपलब्ध नहीं कराएगा। रूस का प्राथमिक कार्य केवल उन हथियारों की मरम्मत करना है जो सोवियत काल से ही अफगानिस्तान में मौजूद हैं और इन पुराने हथियारों के फिर से चालू होने से सैन्य मोर्चे पर तालिबान की स्थिति काफी मजबूत हो सकती है। उल्लेखनीय है कि रूस और तालिबान के बीच यह रक्षा समझौता 30 मई को मॉस्को में आयोजित एक बैठक के दौरान हुआ था।

हथियारों की सूची और भविष्य की योजना

अफगानिस्तान इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार, जमीर काबुलोव ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा कि भविष्य में तालिबान को नए हथियार दिए जाने की संभावना हो सकती है, लेकिन वर्तमान में सारा ध्यान पुराने हथियारों को फिर से सेवा में लाने पर केंद्रित है। तालिबान सरकार के रक्षा मंत्रालय के पास इस समय दर्जनों की संख्या में T-55 और T-62 टैंक मौजूद हैं। इसके अलावा उनके पास BMP-1 और BMP-2 श्रृंखला के बख्तरबंद वाहन (APC/IFV) भी हैं। हवाई शक्ति के रूप में उनके पास Mi-17 और Mi-24 हेलिकॉप्टर उपलब्ध हैं। इन भारी हथियारों के साथ-साथ तालिबान के पास बड़ी संख्या में PKM मशीन गनें भी मौजूद हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और हथियारों का कब्जा

तालिबान के पास इन रूसी हथियारों के पहुंचने का इतिहास काफी पुराना है। 1990 से पहले अफगानिस्तान पर सोवियत संघ का नियंत्रण था। 1979 में तालिबान लड़ाकों ने तत्कालीन सरकार और सोवियत सेना के खिलाफ युद्ध शुरू किया था। जब 1989 में सोवियत सेना ने अफगानिस्तान छोड़ने का निर्णय लिया, तो बड़ी मात्रा में रूसी हथियार वहां की सरकार के पास रह गए, जिन पर बाद में तालिबान ने कब्जा कर लिया। 2001 में अमेरिका के हमले के बाद वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी और अमेरिका ने अफगान सैनिकों को आधुनिक हथियार दिए, लेकिन सोवियत हथियार भी वहां बने रहे। 2021 में जब अमेरिका काबुल से वापस गया, तो तालिबान ने एक बार फिर इन सभी हथियारों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।

रक्षा क्षमताओं का सुदृढ़ीकरण

टैंकों और हेलिकॉप्टरों के अलावा तालिबान के पास सोवियत दौर की तोपें, कंधे से दागी जाने वाली मिसाइलें और पुराने वायु रक्षा यानी एयर डिफेंस सिस्टम भी हैं। उचित रखरखाव और मरम्मत की सुविधा न होने के कारण इनमें से अधिकांश हथियार वर्तमान में पूरी तरह से काम करने की स्थिति में नहीं हैं। तालिबान अब अपनी इन रक्षा क्षमताओं को फिर से सक्रिय करने की कोशिश कर रहा है। रूस की यात्रा से लौटने के बाद काबुल में पत्रकारों से बात करते हुए तालिबान के रक्षा मंत्री ने अपने इरादे स्पष्ट किए। उन्होंने कहा कि वे एक ऐसी सुरक्षा व्यवस्था विकसित कर रहे हैं जिससे दुनिया का कोई भी देश अफगानिस्तान पर हमला करने का साहस न कर सके।