मध्य पूर्व में तनाव एक नए और खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान और उसकी शक्तिशाली सेना इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के खिलाफ एक नई और विनाशकारी धमकी जारी की है। आधी रात को दी गई इस धमकी ने ईरान को एक बार फिर दहला दिया है और यह ऐसे समय में आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध का एक नया और अधिक हिंसक चरण शुरू हो गया है। 30 और 31 अगस्त की दरम्यानी रात को दोनों देशों ने एक-दूसरे पर भारी बारूदी प्रहार किए हैं। जहां अमेरिका ने ईरानी सेना के रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया, वहीं ईरान ने भी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई की है।
युद्ध का नया दौर और लराक द्वीप पर हमला
इस ताजा संघर्ष की शुरुआत को लेकर दोनों देशों के अपने-अपने दावे हैं। ईरानी सेना का आधिकारिक बयान है कि युद्ध की पहल अमेरिका ने की जब उसने एक ईरानी द्वीप पर हमला किया। इसके जवाब में ईरान ने अमेरिकी सेना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। दूसरी ओर, अमेरिका ने एक अलग थ्योरी पेश की है। वाशिंगटन का कहना है कि उसके हमले का मुख्य उद्देश्य ईरान द्वारा नियोजित नए हमलों को पहले ही विफल करना था। अमेरिका के अनुसार, ईरानी सेना अरब देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागने की पूरी तैयारी कर चुकी थी। इससे पहले कि ईरान इन मिसाइलों को लॉन्च कर पाता, अमेरिका ने उसके मिसाइल लॉन्चरों को नष्ट कर दिया। यह हमला विशेष रूप से ईरान के लराक द्वीप पर किया गया था, जहां IRGC के ठिकानों पर 3 भीषण विस्फोट हुए। रिपोर्टों के अनुसार, इस हमले में ईरान के 2 मिसाइल लॉन्चिंग प्लेटफॉर्म पूरी तरह से बर्बाद हो गए हैं।
ईरान की जवाबी कार्रवाई और जॉर्डन में मिसाइल हमला
अमेरिका के इस हमले के तुरंत बाद ईरान ने भी अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया। ईरानी सेना ने आधी रात को ही जॉर्डन में स्थित अमेरिका के दो सैन्य बेस की ओर बैलिस्टिक मिसाइलें दागनी शुरू कर दीं और ईरान ने दावा किया है कि उसका यह हमला पूरी तरह सफल रहा और अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा है। हालांकि, जॉर्डन की सरकार ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि उसने ईरान की सभी 8 बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में ही मार गिराया और उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही तबाह कर दिया। ईरान का यह भी दावा है कि उसने केवल जॉर्डन ही नहीं, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत और बहरीन में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर भी हमले किए हैं। हालांकि UAE ने आधिकारिक तौर पर अपने देश में किसी भी हमले से इनकार किया है, लेकिन क्षेत्र के कई हिस्सों में धमाकों की खबरें आई हैं।
SCO समिट और महाशक्तियों को कड़ा संदेश
यह पूरा घटनाक्रम शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की महत्वपूर्ण बैठक के दौरान हो रहा है। 1 सितंबर को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में SCO समिट आयोजित की जा रही है, जिसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सहित कई देशों के राष्ट्रप्रमुख हिस्सा ले रहे हैं। इस समिट से ठीक पहले ईरान पर हमला करके ट्रंप ने एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और सैन्य संदेश दिया है और यह संदेश न केवल ईरान के लिए है, बल्कि सीधे तौर पर रूस और चीन के लिए भी है। ट्रंप ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ईरान को न तो रूस की सैन्य शक्ति बचा पाएगी और न ही चीन का समर्थन। अमेरिका इस हमले के जरिए ईरान को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करना चाहता है और रूस-चीन को यह दिखाना चाहता है कि वह उनके प्रभाव वाले क्षेत्र में भी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा।
तेल का खेल और चीन की भूमिका
ईरान की अर्थव्यवस्था और उसकी सैन्य शक्ति का एक बड़ा हिस्सा उसके तेल निर्यात पर निर्भर है। अमेरिकी नाकाबंदी और कड़े प्रतिबंधों के बावजूद, ईरान वर्तमान में प्रतिदिन 15 लाख बैरल तेल का निर्यात करने में सफल हो रहा है। इस निर्यात का सबसे बड़ा हिस्सा, यानी लगभग 13 लाख बैरल तेल प्रतिदिन, अकेले चीन खरीद रहा है। यह कुल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत है। चीन यह तेल गुप्त रास्तों और सीक्रेट रूट के जरिए खरीदता है, जिससे ईरान को वह धन प्राप्त होता है जिसका उपयोग वह अपनी सेना को मजबूत करने और अमेरिका के खिलाफ युद्ध लड़ने में कर रहा है और ट्रंप अब नए प्रतिबंधों और सैन्य हमलों के जरिए चीन और ईरान के बीच होने वाले इसी गुप्त तेल व्यापार को पूरी तरह बंद करना चाहते हैं।
निष्कर्ष: क्या बढ़ेगा महाशक्तियों के बीच टकराव?
ट्रंप की इस कार्रवाई ने वैश्विक राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। हालांकि ट्रंप ने पुतिन और जिनपिंग को सीधी चुनौती दी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि रूस और चीन इतनी आसानी से पीछे हटने वाले नहीं हैं। वे न तो अमेरिका की धमकियों से डरने वाले हैं और न ही ईरान को दी जाने वाली अपनी मदद रोकने वाले हैं और ऐसी स्थिति में, ईरान को केंद्र में रखकर दुनिया की महाशक्तियों के बीच एक भीषण और सीधे युद्ध की आशंका बढ़ गई है। एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगी हो सकते हैं, तो दूसरी तरफ रूस और चीन के साथ ईरान खड़ा नजर आ सकता है। अब पूरी दुनिया की नजरें बिश्केक में हो रही SCO समिट पर टिकी हैं कि वहां पुतिन और जिनपिंग ट्रंप के इस बारूदी संदेश का क्या जवाब देते हैं।
