ट्रंप-जिनपिंग की बीजिंग डील: ताइवान और जापान समेत इन 5 देशों की बढ़ी टेंशन

बीजिंग में डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच हो रही उच्च स्तरीय वार्ता ने ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया, फिलिपींस और ऑस्ट्रेलिया की चिंताएं बढ़ा दी हैं। शी जिनपिंग द्वारा ताइवान को हथियार न देने के मुद्दे पर जोर देने से दक्षिण एशिया के सुरक्षा समीकरणों में बड़े बदलाव की आशंका है।

बीजिंग में दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों, अमेरिका और चीन के बीच हो रही उच्च स्तरीय वार्ता ने वैश्विक राजनीति में हलचल पैदा कर दी है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बीजिंग में हो रही इस महत्वपूर्ण डील पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। विशेष रूप से, शी जिनपिंग ताइवान के मुद्दे पर एक बड़ी डील की उम्मीद कर रहे हैं, जिसका सीधा असर दक्षिण एशिया और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के सुरक्षा समीकरणों पर पड़ सकता है और इस संभावित समझौते के कारण दुनिया के कम से कम पांच प्रमुख देश—दक्षिण कोरिया, ताइवान, जापान, फिलिपींस और ऑस्ट्रेलिया—गहरी चिंता और तनाव में हैं। ये सभी देश अब तक अमेरिका के साथ अपने मजबूत संबंधों के कारण चीन के धुर-विरोधी रहे हैं, लेकिन अब उन्हें डर है कि ट्रंप और जिनपिंग के बीच होने वाला कोई भी समझौता उनके हितों को प्रभावित कर सकता है।

ताइवान और फिलिपींस की सुरक्षा पर मंडराता खतरा

ताइवान के लिए यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील है, क्योंकि उसकी स्वतंत्रता और सुरक्षा काफी हद तक अमेरिकी समर्थन पर टिकी हुई है। पेंटागन की एक हालिया खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, चीन वर्ष 2027 तक ताइवान पर हमला करने की योजना बना सकता है। चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और शी जिनपिंग ने ट्रंप के साथ मुलाकात में स्पष्ट रूप से ताइवान को हथियार दिए जाने का मुद्दा उठाया है और जिनपिंग का तर्क है कि अमेरिका को चीन का प्रतिद्वंदी बनने के बजाय उसका दोस्त बनना चाहिए। यदि ट्रंप ताइवान को हथियार न देने की चीन की मांग पर सहमति जता देते हैं, तो इससे ताइवान की संप्रभुता खतरे में पड़ सकती है।

वहीं, फिलिपींस की स्थिति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। साउथ चाइना सी में चीन का पड़ोसी होने के नाते, फिलिपींस के कई द्वीपों को लेकर बीजिंग के साथ लंबे समय से विवाद चल रहा है। फिलिपींस अपनी रक्षा और खुफिया जानकारी के लिए पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर है। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और चीन के बीच किसी भी तरह का समझौता साउथ चाइना सी के आसपास के इन देशों के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है, क्योंकि इससे इस क्षेत्र में चीन का दबदबा और अधिक बढ़ जाएगा।

जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया की बढ़ती चिंताएं

जापान और चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता का इतिहास काफी पुराना है, जिसमें 1950 के दशक के आसपास हुआ युद्ध भी शामिल है। वर्तमान में जापान साउथ चाइना सी में चीन का सबसे मुखर और मजबूत विरोधी बनकर उभरा है। यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि दुनिया का लगभग 25 प्रतिशत व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होता है। जापान की रक्षा की जिम्मेदारी वर्तमान में अमेरिका के पास है, ऐसे में बीजिंग के साथ ट्रंप का कोई भी समझौता टोक्यो की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा सकता है।

दक्षिण कोरिया भी इस समय दोहरे दबाव में है। एक तरफ प्योंगयांग (उत्तर कोरिया) का खतरा है और दूसरी तरफ बीजिंग का प्रभाव। 1950 से ही दक्षिण कोरिया की रक्षा नीति पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर रही है। हालांकि, ट्रंप होर्मुज जलडमरूमध्य के मुद्दे को लेकर दक्षिण कोरिया से कुछ नाराज बताए जा रहे हैं। यदि हथियारों की आपूर्ति को लेकर ट्रंप और जिनपिंग के बीच कोई सहमति बनती है, तो इसका सीधा और गहरा असर दक्षिण कोरिया की सुरक्षा स्थिति पर पड़ेगा और इसी तरह, ऑस्ट्रेलिया भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका का एक प्रमुख सहयोगी रहा है और चीन का कड़ा विरोध करता रहा है। अब उसे डर सता रहा है कि दो महाशक्तियों के बीच होने वाली यह डील उसे क्षेत्रीय राजनीति में अलग-थलग कर सकती है।

ट्रंप के चीन दौरे के तीन प्रमुख रणनीतिक कारण

डोनाल्ड ट्रंप का यह चीन दौरा लगभग 9 साल बाद हो रहा है। इससे पहले वह नवंबर 2017 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान बीजिंग गए थे।

बीजिंग में हो रही इस मुलाकात के दौरान शी जिनपिंग ने इस बात पर जोर दिया है कि अमेरिका और चीन को एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होने के बजाय सहयोग का रास्ता चुनना चाहिए। हालांकि, इस 'सहयोग' की कीमत उन पांच देशों को चुकानी पड़ सकती है जो अब तक अमेरिकी सुरक्षा छतरी के नीचे चीन का मुकाबला कर रहे थे। ट्रंप का यह दौरा न केवल अमेरिका और चीन के संबंधों को नई दिशा दे सकता है, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया के भविष्य के समीकरणों को भी पूरी तरह से बदल सकता है।