भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता: अजीत डोभाल की वाशिंगटन यात्रा के बाद बनी सहमति

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के बीच हुई गोपनीय बातचीत ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की नींव रखी। इस वार्ता में भारत ने स्पष्ट किया कि वह दबाव में नहीं झुकेगा, जिसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने टैरिफ में कटौती की घोषणा की।

भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए व्यापार समझौते के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल की गोपनीय कूटनीति को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल सितंबर में डोभाल ने वाशिंगटन में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की थी। इस बैठक का उद्देश्य दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को कम करना और व्यापारिक रिश्तों को पुनः पटरी पर लाना था। रिपोर्ट के अनुसार, डोभाल ने स्पष्ट संदेश दिया था कि भारत व्यापारिक मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन वह किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव के आगे नहीं झुकेगा।

डोभाल की वाशिंगटन यात्रा और भारत का कड़ा रुख

सितंबर की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस और चीन के नेताओं के साथ मुलाकात के बाद, भारत ने अमेरिका के साथ बिगड़ते संबंधों को सुधारने की दिशा में कदम उठाए। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अजीत डोभाल ने वाशिंगटन में मार्को रूबियो से मुलाकात के दौरान भारत का पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिकी प्रशासन सख्त रुख अपनाता है, तो भारत मौजूदा कार्यकाल के समाप्त होने तक प्रतीक्षा करने के लिए तैयार है। डोभाल ने यह भी आग्रह किया कि अमेरिकी नेतृत्व को भारत के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी बंद करनी चाहिए ताकि कूटनीतिक माहौल को सुधारा जा सके।

तनावपूर्ण पृष्ठभूमि और ट्रम्प के रुख में बदलाव

यह कूटनीतिक प्रयास ऐसे समय में हुआ जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारतीय सामानों पर 50% टैक्स लगाने की घोषणा की थी और भारतीय अर्थव्यवस्था की आलोचना की थी। ट्रम्प ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भी भारत पर सवाल उठाए थे। हालांकि, डोभाल की वार्ता के बाद स्थितियों में बदलाव देखा गया। 16 सितंबर को ट्रम्प ने प्रधानमंत्री मोदी को उनके जन्मदिन पर फोन किया और उनके नेतृत्व की सराहना की। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच कई बार टेलीफोनिक बातचीत हुई, जिससे व्यापारिक समझौते का मार्ग प्रशस्त हुआ।

व्यापार समझौते के प्रमुख बिंदु और अनिश्चितताएं

राष्ट्रपति ट्रम्प ने हाल ही में घोषणा की कि भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैक्स को घटाकर 18% कर दिया गया है और रूस से तेल आयात पर लगा अतिरिक्त 25% टैक्स भी हटा लिया गया है। ट्रम्प के दावों के अनुसार, इसके बदले में भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदेगा और अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ कम करेगा। हालांकि, भारत सरकार ने अभी तक इन शर्तों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है और न ही किसी लिखित समझौते का विवरण सार्वजनिक किया गया है। भारतीय अधिकारियों के लिए यह घोषणा अप्रत्याशित थी, क्योंकि कई संबंधित विभाग इस कॉल की जानकारी से अनभिज्ञ थे।

रणनीतिक स्वायत्तता और भविष्य का विश्लेषण

विश्लेषकों के अनुसार, भारत अमेरिका को एक दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार मानता है, जो चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य के लिए आवश्यक है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बीच हालिया बैठकों ने रक्षा और व्यापारिक सहयोग को और मजबूती दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ आर्थिक संबंधों को संतुलित कर रहा है। भारत ने रूस, यूरोप और ब्रिटेन के साथ भी अपने व्यापारिक संबंधों को विस्तार देना जारी रखा है ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम की जा सके।

निष्कर्ष के तौर पर, डोभाल की बैकडोर बातचीत ने भारत-अमेरिका संबंधों में जमी बर्फ को पिघलाने का काम किया है। हालांकि व्यापार समझौते की पूर्ण शर्तों पर स्पष्टता का इंतजार है, लेकिन यह स्पष्ट है कि दोनों देश आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह समझौता धरातल पर किस प्रकार लागू होता है और भारत की निर्यात अर्थव्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

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