लूला डी सिल्वा के खिलाफ ट्रंप की चाल? ब्राजील में तख्तापलट के संकेत, जानें मुख्य अपडेट

ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच तनाव बढ़ रहा है। जानकारों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन लूला सरकार को हटाने की कोशिश कर सकता है, जिसके पीछे तीन बड़े संकेत दिखाई दे रहे हैं।

ब्राजील की राजनीति में एक बार फिर से भूचाल आने की पूरी आशंका जताई जा रही है क्योंकि हाल ही में ऐतिहासिक उलटफेर करते हुए ८१ वर्षीय लूला डी सिल्वा ने राष्ट्रपति की कुर्सी फिर से हासिल कर ली है, लेकिन उनके लिए सत्ता में बने रहना आसान नहीं होगा। लूला डी सिल्वा लंबे वक्त से डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर हैं और उन्हें सत्ता से हटाने के लिए अमेरिकी प्रशासन लगातार दबाव बना रहा है। अब चुनाव में जीत के बाद 81 वर्षीय लूला की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ सकती हैं और आशंका जताई जा रही है कि आने वाले वक्त में ट्रंप प्रशासन लूला सरकार को सत्ता से हटाने की कोशिश कर सकता है। इस संभावित खतरे के पीछे तीन मुख्य संकेत अभी से स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं, जिनका गहराई से विश्लेषण करना बेहद जरूरी है।

ब्राजील के चुनाव में जीत हासिल करने वाले लूला के सामने सबसे बड़ी भौगोलिक और राजनीतिक चुनौती यह है कि ब्राजील भौगोलिक रूप से अमेरिका के काफी करीब स्थित है और दोनों देशों के बीच सबसे कम दूरी करीब ७००० किलोमीटर है। इसके अलावा दूसरी सबसे बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और लूला डी सिल्वा के बीच बेहद तनावपूर्ण रिश्ते हैं। हालिया चुनाव में ट्रंप ने लूला के विरोधियों का खुलकर समर्थन किया था और उन पर भारी दबाव बनाने की पूरी कोशिश की थी, हालांकि उस समय लूला को सत्ता से बाहर करने में उन्हें सफलता नहीं मिल पाई थी। लेकिन अब चुनाव जीतने के बाद लूला डी सिल्वा के सामने आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं, क्योंकि अमेरिका का दक्षिण अमेरिकी क्षेत्र में कड़ा प्रभाव रहा है।

तख्तापलट के इतिहास और सीनियर बोल्सोनारो की स्थिति

इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में साल २०२२ की वह घटना भी शामिल है जब सीनियर बोल्सोनारो को हराकर लूला देश के राष्ट्रपति बने थे, लेकिन अपने पद की शपथ लेने से पहले ही उनके खिलाफ एक गहरी तख्तापलट की साजिश रची गई थी। इस हाई-प्रोफाइल मामले में सीनियर बोल्सोनारो को अदालत द्वारा २७ साल की लंबी जेल की सजा सुनाई जा चुकी है और वे इस वक्त अपने घर पर हाउस अरेस्ट हैं। दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह है कि दूसरी तरफ अमेरिका ने सीनियर बोल्सोनारो को यह सजा सुनाने वाले ब्राजील के जजों के ऊपर कड़े प्रतिबंध यानी बैन लगा रखे हैं, जो दोनों देशों के बीच के कूटनीतिक तनाव को साफ तौर पर उजागर करता है।

पहला संकेत: बोल्सोनारो द्वारा हार स्वीकार न करना और धांधली के गंभीर आरोप

तख्तापलट की आशंका का पहला बड़ा संकेत यह है कि ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव में लूला के मुकाबले ट्रंप समर्थित बोल्सोनारो मैदान में डटे हुए थे। चुनाव के पहले चरण में उन्हें अच्छी बढ़त मिली थी, लेकिन निर्णायक दूसरे चरण के चुनाव में उन्हें अंततः हार का सामना करना पड़ा। हार के तुरंत बाद बोल्सोनारो ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि दूसरे चरण के चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली की गई है, क्योंकि चुनाव के आखिरी वक्त में मतदान के लिए दो घंटे का समय बढ़ा दिया गया था।

इन तमाम वजहों से बोल्सोनारो ने चुनाव के आधिकारिक परिणामों को स्वीकार करने से पूरी तरह इनकार कर दिया है। बोल्सोनारो का लगातार यह आरोप है कि चुनाव पूरी तरह गलत तरीके से और पक्षपातपूर्ण ढंग से कराए गए हैं, और यही कारण है कि इसमें लूला की जीत हुई है। इतिहास गवाह है कि अमेरिका पहले भी दुनिया के कई देशों में चुनाव में धांधली या हस्तक्षेप का आरोप लगाकर वहां तख्तापलट कर चुका है या करा चुका है। ऐसे ऐतिहासिक उदाहरणों में बांग्लादेश वर्ष २०२४, बोलविया वर्ष २०१९ और ईरान वर्ष १९५३ प्रमुख रूप से शामिल हैं और अब जिस तरीके से बोल्सोनारो लगातार धांधली का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहे हैं, उससे साफ लग रहा है कि अमेरिका और उनके समर्थित बोल्सोनारो इस चुनाव परिणाम को किसी भी कीमत पर स्वीकार्यता देने के मूड में नहीं हैं.

दूसरा संकेत: बीच चुनाव में अमेरिकी अधिकारियों द्वारा तख्तापलट की सक्रिय कोशिशें

इस पूरी साजिश और खतरे का दूसरा सबसे बड़ा संकेत अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आई रिपोर्टों से मिलता है। प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने गत २४ अक्टूबर को एक सनसनीखेज रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें यह बड़ा दावा किया गया था कि व्हाइट हाउस से जुड़े दो वरिष्ठ अधिकारी लूला को सत्ता से हटाने की कोशिशों में पूरी तरह सक्रिय रूप से शामिल थे। रिपोर्ट के मुताबिक, इन अमेरिकी अधिकारियों ने लूला सरकार पर लगातार अनुचित दबाव बनाया, हालांकि उस वक्त उन्हें अपने मंसूबों में पूरी तरह सफलता नहीं मिल पाई थी।

वर्ष २०२५ में डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा व्हाइट हाउस की सत्ता संभालने के बाद से ही ब्राजील लगातार अमेरिकी प्रशासन की तीखी नजर में रहा है। लूला सरकार पर अपनी धौंस जमाने और दबाव बनाने के लिए पिछले करीब दो वर्षों में ट्रंप प्रशासन की ओर से कई आक्रामक कदम उठाए गए हैं। हालांकि यह अलग बात है कि अब तक लूला को सत्ता से हटाने में अमेरिकी प्रशासन को सीधी सफलता नहीं मिली है, लेकिन आने वाले समय में इस दबाव के और अधिक खतरनाक स्तर तक बढ़ने की प्रबल आशंका जताई जा रही है।

तीसरा संकेत: दक्षिण अमेरिका का एकमात्र देश जो वाशिंगटन के खिलाफ खड़ा है

तीसरा और सबसे अहम संकेत कूटनीतिक मोर्चे पर देखने को मिल रहा है। लूला की इस ऐतिहासिक जीत पर दुनिया भर के कई बड़े नेताओं ने उन्हें गर्मजोशी से बधाई दी है, लेकिन इसके विपरीत ट्रंप प्रशासन की ओर से इस जीत पर कोई भी औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है। खबर लिखे जाने तक अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी सार्वजनिक रूप से लूला को किसी भी प्रकार की बधाई नहीं दी थी, जबकि आमतौर पर ट्रंप विदेशी नेताओं की जीत पर सोशल मीडिया के माध्यम से तुरंत अपनी प्रतिक्रिया देते रहे हैं।

अगर भौगोलिक और राजनीतिक समीकरणों को देखें तो पश्चिमी गोलार्द्ध के दक्षिण अमेरिकी क्षेत्र में कुल १२ स्वतंत्र देश मौजूद हैं, जिनमें ब्राजील भी शामिल है। ब्राजील को छोड़कर बाकी सभी ११ देशों पर इस वक्त प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका का भारी राजनीतिक प्रभाव बना हुआ है और इसी साल अमेरिकी प्रशासन ने वेनेजुएला में सीधी सैन्य कार्रवाई करते हुए वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण तक कर लिया था। इस गंभीर घटना को लेकर अमेरिका के खिलाफ न तो वेनेजुएला की जनता द्वारा और न ही दुनिया के किसी अन्य हिस्से में कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। मादुरो के इस सनसनीखेज प्रकरण के बाद अब पूरी दुनिया की नजरें सिर्फ और सिर्फ लूला डी सिल्वा पर टिकी हुई हैं, और इसी वजह से चुनाव में जीत मिलने के बाद भी लूला डी सिल्वा की मुश्किलें कम होने के बजाय और अधिक बढ़ती हुई नजर आ रही हैं।