राजस्थान स्कूलों में राजस्थानी भाषा: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, 2026 तक रिपोर्ट तलब

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को चरणबद्ध तरीके से लागू करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने 30 सितंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट मांगी है, जिसमें मातृभाषा में शिक्षा को बच्चों के विकास के लिए अनिवार्य बताया गया है।

राजस्थान में लंबे समय से उठ रही राजस्थानी भाषा को शिक्षा व्यवस्था में शामिल करने की मांग पर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि वह राजस्थानी भाषा को राज्य के सभी सरकारी और निजी विद्यालयों में चरणबद्ध तरीके से लागू करने के लिए ठोस, प्रभावी और समयबद्ध कदम उठाए। अदालत ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस आदेश के क्रियान्वयन के संबंध में 30 सितंबर 2026 तक एक विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) पेश करे। न्यायालय का यह निर्णय उन लाखों लोगों के लिए एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है जो वर्षों से अपनी मातृभाषा को शैक्षणिक मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।

राजस्थानी भाषा का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

इस मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ द्वारा की गई। सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने राजस्थानी भाषा की महत्ता पर विस्तार से चर्चा की और अदालत ने रेखांकित किया कि राजस्थानी भाषा का अपना एक अत्यंत समृद्ध साहित्यिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता ने माना कि यह भाषा पहले से ही राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के स्तर पर पढ़ाई जा रही है और ऐसे में, जब यह भाषा उच्च शिक्षण संस्थानों में पहले से ही स्थापित है, तो इसकी शैक्षणिक मान्यता और इसके महत्व पर किसी भी प्रकार का सवाल नहीं उठाया जा सकता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जो भाषा सांस्कृतिक रूप से इतनी सशक्त हो, उसे प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर भी स्थान मिलना चाहिए।

सरकार के 'सीमित दृष्टिकोण' पर न्यायालय की कड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की वर्तमान नीति पर भी गंभीर टिप्पणी की। वर्तमान में राज्य सरकार की नीति के अनुसार, केवल उन्हीं भाषाओं को अतिरिक्त भाषा के रूप में स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है जो भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हैं। अदालत ने सरकार के इस रुख को एक “सीमित दृष्टिकोण” करार दिया। खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करना बच्चों के बौद्धिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए बेहद जरूरी है। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और भारतीय संविधान की मूल भावना भी बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराने पर विशेष जोर देती है, ताकि उनका सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो सके।

संवैधानिक अधिकारों और शिक्षा नीति का समन्वय

खंडपीठ ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यद्यपि न्यायालय सामान्यतः शिक्षा नीति बनाने की प्रक्रिया में सीधे तौर पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहता, लेकिन जब संवैधानिक अधिकारों के क्रियान्वयन में शासन की ओर से लगातार निष्क्रियता दिखाई देती है, तब अदालत मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती। कोर्ट ने कहा कि शिक्षा नीति का उद्देश्य छात्रों का कल्याण होना चाहिए और यदि मातृभाषा को शामिल न करने से उनके अधिकारों का हनन हो रहा है, तो न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

याचिकाकर्ताओं की मांग और जनगणना के आंकड़े

यह पूरा कानूनी मामला पदम मेहता और अन्य की ओर से दायर एक जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मनीष सिंघवी और अधिवक्ता अपूर्व सिंघवी ने अदालत के समक्ष मजबूती से पक्ष रखा। उन्होंने मांग की थी कि राजस्थानी भाषा को न केवल स्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, बल्कि इसे शिक्षक भर्ती परीक्षाओं और विशेष रूप से राजस्थान शिक्षक पात्रता परीक्षा (REET) में भी स्थान दिया जाए और 36 करोड़ लोग राजस्थानी भाषा बोलते हैं। इतनी बड़ी आबादी द्वारा बोली जाने वाली और व्यापक रूप से प्रचलित भाषा को राज्य की शिक्षा व्यवस्था में उचित और सम्मानजनक स्थान मिलना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

उल्लेखनीय है कि इस मामले में पहले राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि शिक्षा नीति से जुड़े जटिल मामलों में अदालत सीधे तौर पर सरकार को निर्देश जारी नहीं कर सकती। हालांकि, जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो शीर्ष अदालत ने मामले की संवेदनशीलता और भाषाई अधिकारों की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार को सक्रिय कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले के बाद अब राजस्थान के सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने का मार्ग पूरी तरह से प्रशस्त हो गया है।