शेख हसीना का बड़ा दांव: संन्यास का ऐलान और जातीय पार्टी के साथ सीक्रेट गेम प्लान

बांग्लादेश चुनाव से पहले शेख हसीना ने संन्यास के संकेत देकर सबको चौंका दिया है। आवामी लीग अब जातीय पार्टी के जरिए सत्ता के गलियारों में वापसी की फिराक में है।

बांग्लादेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आने वाला है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने चुनाव से ठीक पहले संन्यास के संकेत देकर एक ऐसा दांव चला है, जिसने उनके विरोधियों की नींद उड़ा दी है। यह केवल एक राजनीतिक विदाई नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। हसीना संन्यास के जरिए जहां अपने समर्थकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश कर रही हैं, वहीं। उनकी पार्टी आवामी लीग पर्दे के पीछे से जातीय पार्टी के जरिए अपनी किलेबंदी मजबूत करने में जुटी है।

संन्यास के पीछे का इमोशनल कार्ड

शेख हसीना के बेटे साजिद वाजिद ने स्पष्ट किया है कि उनकी मां ने राजनीति से हटने का मन बना लिया है। 78 साल की हसीना ने अपनी सेहत और देश के मौजूदा हालात को देखते हुए यह फैसला लिया है। जानकारों का मानना है कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह की घोषणा वोटरों के बीच सहानुभूति पैदा कर सकती है और आवामी लीग के समर्थक, जो फिलहाल बिखरे हुए महसूस कर रहे हैं, वे इस भावनात्मक अपील के बाद एकजुट हो सकते हैं। वाजिद का कहना है कि आवामी लीग 70 साल पुरानी पार्टी है और यह। हसीना के बिना भी चलती रहेगी, लेकिन उनकी विरासत पार्टी का मार्गदर्शन करती रहेगी।

जातीय पार्टी के साथ पर्दे के पीछे का खेल

बांग्लादेश में आवामी लीग के चुनाव लड़ने पर फिलहाल पाबंदियां हैं और ऐसे में पार्टी ने अपनी रणनीति बदलते हुए जातीय पार्टी को समर्थन देने का फैसला किया है। द बिजनेस स्टैंडर्ड बांग्लादेश की रिपोर्ट के अनुसार, जातीय पार्टी ने आवामी लीग के कई कद्दावर नेताओं को अपनी टिकट पर चुनावी मैदान में उतारा है। इनमें इलियास हुसैन (तंगैल-1) और तारेक शम्स (तंगेल-6) जैसे नाम शामिल हैं। यह गठबंधन सीधे तौर पर नहीं बल्कि एक गुप्त समझौते के तहत काम कर रहा है ताकि आवामी लीग का वोट बैंक जातीय पार्टी के खाते में जा सके।

चुनाव का गणित और 151 का आंकड़ा

बांग्लादेश में 12 फरवरी को 300 संसदीय सीटों पर मतदान होना है। सरकार बनाने के लिए किसी भी दल या गठबंधन को 151 सीटों के जादुई आंकड़े की जरूरत होती है। वर्तमान में मुकाबला बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी गठबंधन बनाम अन्य के बीच दिख रहा है। शेख हसीना की रणनीति यह है कि अगर जातीय पार्टी किंगमेकर की भूमिका में आती है, तो भविष्य में आवामी लीग के लिए ढाका की सत्ता में वापसी की राह आसान हो जाएगी।

जमात और बीएनपी को रोकने की रणनीति

आवामी लीग का मुख्य उद्देश्य जमात-ए-इस्लामी को तीसरे नंबर पर धकेलना है। प्रथम आलो के एक सर्वे के मुताबिक, आज भी 26 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि आवामी लीग चुनाव लड़े। इसी जनाधार को बचाने के लिए जातीय पार्टी को एक 'तीसरे विकल्प' के रूप में पेश किया जा रहा है। अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो शेख हसीना का यह आखिरी दांव बांग्लादेश की राजनीति की दिशा बदल सकता है।

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