अमेरिका का ऑपरेशन इकोनॉमिक D-डे: ईरान को पूरी तरह अलग-थलग करने की बड़ी तैयारी

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने ईरान के खिलाफ 'ऑपरेशन इकोनॉमिक D-डे' का ऐलान किया है। इसके तहत 60 संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाए गए हैं और चीन जैसे देशों को तेहरान से व्यापार बंद करने की चेतावनी दी गई है। अमेरिका का लक्ष्य ईरान की आर्थिक जीवनरेखा को पूरी तरह काटना है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह से अलग-थलग करने के लिए एक बेहद आक्रामक अभियान शुरू किया है, जिसे ऑपरेशन इकोनॉमिक D-डे का नाम दिया गया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब क्षेत्र में चल रहा संघर्ष अब अपने छह महीने पूरे करने की कगार पर है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने इस अभियान की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि वॉशिंगटन अब तेहरान पर आर्थिक दबाव को उस स्तर तक ले जाएगा जहां उसका दम घुटने लगे। इस अभियान के तहत उन सभी देशों और संस्थाओं को भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा जो ईरान के साथ किसी भी प्रकार का व्यापार या वित्तीय संबंध जारी रखे हुए हैं।

आर्थिक दम घोंटने का मास्टर प्लान

एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान स्कॉट बेसेंट ने इस आर्थिक हमले के पीछे के उद्देश्यों को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन का मुख्य मकसद उन सभी आर्थिक रास्तों और गलियारों को पूरी तरह से बंद करना है जिनका उपयोग ईरान राजस्व कमाने और अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए करता रहा है। वॉशिंगटन का स्पष्ट लक्ष्य ईरानी सरकार को मिलने वाली हर उस वित्तीय जीवनरेखा को काटना है जो उसे सत्ता में बनाए रखने में मदद करती है। बेसेंट ने दुनिया भर के नेताओं और व्यापारिक संस्थाओं को चेतावनी दी है कि वे तेहरान के साथ अपने रिश्तों पर फिर से विचार करें, अन्यथा उन्हें गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ेगा।

ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट और डेडलाइन

इस व्यापक रणनीति के एक हिस्से के रूप में ट्रेजरी विभाग ने ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट नामक एक योजना भी पेश की है। बेसेंट के अनुसार, अमेरिकी विभाग ने उन सभी नेटवर्कों की बारीकी से पहचान कर ली है जिनका उपयोग ईरान तेल की तस्करी करने, फंड तक पहुंच बनाने और प्रतिबंधों को चकमा देने के लिए करता है। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने हर उस नोड, हर मददगार और हर उस नेटवर्क का पता लगा लिया है जो इस अवैध व्यापार में शामिल है। अब वॉशिंगटन दुनिया भर की सरकारों से इन गतिविधियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की उम्मीद कर रहा है। बेसेंट ने जोर देकर कहा कि हर देश के पास इन गतिविधियों को बंद करने के लिए एक निश्चित समय-सीमा यानी डेडलाइन है। हालांकि उन्होंने इस समय-सीमा की सटीक अवधि का खुलासा नहीं किया, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि समय शुरू हो चुका है।

60 ठिकानों और शैडो-फ्लीट पर बड़ा प्रहार

इस अभियान की शुरुआत के साथ ही अमेरिकी ट्रेजरी ने ईरान से जुड़ी लगभग 60 संस्थाओं, व्यक्तियों और जहाजों के खिलाफ प्रतिबंधों के एक नए और कड़े दौर की घोषणा की है। इन प्रतिबंधों के दायरे में ईरान के तेल, परमाणु, मिसाइल और साइबर नेटवर्क जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। विशेष रूप से उन ब्रोकर कंपनियों के नेटवर्क को निशाना बनाया गया है जो संयुक्त अरब अमीरात, हांगकांग, चीन, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड और यूरोप के माध्यम से शैडो-फ्लीट यानी गुप्त रूप से चलने वाले जहाजों के बेड़े को सहायता प्रदान कर रहे हैं। ये जहाज अंतरराष्ट्रीय नियमों को ताक पर रखकर ईरानी तेल की आवाजाही सुनिश्चित करते हैं।

सेकेंडरी प्रतिबंधों का विस्तार और वित्तीय दबाव

अमेरिका द्वारा लगाए गए इन नए प्रतिबंधों में डिजिटल एसेट्स, नई टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग से जुड़ी गतिविधियां भी शामिल की गई हैं और वॉशिंगटन ने संकेत दिया है कि इन क्षेत्रों पर भविष्य में और भी कड़े सेकेंडरी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जो उन तीसरे देशों की संस्थाओं को प्रभावित करेंगे जो ईरान के साथ व्यापार करती हैं। इसके अलावा, ट्रेजरी विभाग ने उन सामान्य लाइसेंसों को भी रद्द कर दिया है जिनके माध्यम से ईरान को कुछ विशेष प्रकार के रेमिटेंस यानी विदेश से भेजी जाने वाली रकम प्राप्त करने की अनुमति थी। बेसेंट ने यह भी खुलासा किया कि इस हफ्ते के अंत तक एक बड़ी वित्तीय संस्था पर भी प्रतिबंध लगाया जा सकता है, जो ईरान के वित्तीय तंत्र को सहारा दे रही है।

राष्ट्रपति ट्रंप की सक्रियता और वैश्विक अपील

ट्रेजरी सेक्रेटरी ने जानकारी दी कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्वयं इस अभियान की कमान संभाले हुए हैं और वे व्यक्तिगत रूप से विदेशी नेताओं से संपर्क कर रहे हैं। ट्रंप दुनिया के विभिन्न नेताओं को फोन करके उनसे ईरान के साथ अपने सभी आर्थिक और कूटनीतिक संबंध खत्म करने की विशेष अपील कर रहे हैं। प्रशासन का दावा है कि इस कोशिश के सकारात्मक नतीजे पिछले वीकेंड से ही दिखने शुरू हो गए हैं और बेसेंट ने स्पष्ट संदेश दिया कि जो देश अमेरिका के साथ खड़े होंगे, उन्हें अमेरिकी साझेदारी का लाभ मिलेगा, जबकि ईरान के साथ जुड़े रहने वाले देशों को एक कमजोर और अलग-थलग पड़ती सरकार के साथ रहने का नुकसान उठाना पड़ेगा।

ईरान का पलटवार और गालिबाफ का बयान

अमेरिका के इस बढ़ते आर्थिक दबाव के बीच ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेरी गालिबाफ ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने वॉशिंगटन की इन चेतावनियों को महज डींगें करार दिया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में गालिबाफ ने कहा कि अमेरिकी जानते हैं कि उनकी इन बातों पर अब कोई विश्वास नहीं करता और उन्होंने तर्क दिया कि अमेरिका वर्तमान में ऐसी आर्थिक स्थिति में नहीं है कि वह दूसरे देशों के ईरान के साथ संबंधों को और अधिक सीमित कर सके। गालिबाफ ने यह भी दावा किया कि ईरान के व्यापारिक साझेदारों ने संदेशों के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है कि वे वॉशिंगटन की इन धमकियों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं और इन बयानों का उनके लिए कोई महत्व नहीं है।

चीन की भूमिका और वैश्विक ऊर्जा संकट

चीन पिछले कई वर्षों से ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है, जो अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती है। वॉशिंगटन अब चीन द्वारा की जाने वाली इस खरीद को रोकने के लिए अपनी कोशिशें तेज कर रहा है। हालांकि, अब तक अमेरिका ने उन बड़े चीनी बैंकों पर सीधे प्रतिबंध लगाने से परहेज किया है जो इस व्यापार में वित्तीय मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है जब होर्मुज स्ट्रेट से तेल और कच्चे माल की ढुलाई अभी भी बाधित है, जिसके कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। हालांकि ईरान ने अतीत में नई फ्रंट कंपनियां बनाकर और जहाजों के नाम बदलकर प्रतिबंधों से बचने के तरीके खोजे हैं, लेकिन अमेरिका का दावा है कि इस बार का ऑपरेशन इकोनॉमिक D-डे इन सभी रास्तों को बंद कर देगा।