लाइफस्टाइल / धारा 377 फैसले के एक साल बाद भी एलिजिबिलिटी समुदाय के लोगो की सुरक्षा के लिए लंबी लड़ाई जारी

Zoom News : Sep 06, 2019, 10:42 AM

ठीक एक साल पहले इसी दिन यानी छह सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने नवतेज सिंह जौहर मामले में अपने फैसले में कहा था कि भारत के एलजीबीटी समुदाय को समानता, गैर-भेदभाव, गरिमा, अभिव्यक्ति, प्राणऔर दैहिक स्वतंत्रता के संवैधानिक मूल्यों का संरक्षण प्रदान किया जाएगा। अदालत ने भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 377 या अप्राकृतिक यौन अपराधों के दंड संबंधी प्रावधान को खारिज कर दिया था। आज जब हम इस अनोखे भारत में इस आजादी के एक वर्ष पूरे होने पर खुशी मना रहे हैं तो हमें अपने संविधान और उसके मूल्यों पर भी नजर डाल लेनी चाहिए जिसकी वजह से अदालती में यह लड़ाई चल पाई और जीत के इस मुकाम तक पहुंच सकी।

साल 2013 में अदालत से मिली हार के बावजूद अप्रैल 2016 में नवतेज जौहर के नेतृत्व में पांच एलजीबीटी भारतीयों ने अपनी याचिकाएं दाखिल कीं। इनमें उन्होंने कहा था कि हमारा समानता, गरिमा, गैर-भेदभाव, जिंदगी और आजादी के संविधान द्वारा दिए गए वचन में पूर्ण विश्वास है और उनके इसी विश्वास ने हम वकीलों उनके मामलों को अदालत ले जाने का मौका दिया। जनवरी 2018 में नवतेज जौहर की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया था। इसके बाद जुलाई 2018 तक पांच और रिट याचिकाएं दायर हुर्इं। एक कारोबारी घराने के सदस्य केशव सूरी से लेकर आरिफ जफर, जिन्हें समलैंगिक होने के अपराध में जेल हो गई थी, रंगीन कुर्ते और जींस पहने आइआइटी से निकली नौजवान पीढ़ी से लेकर हमसफर ट्रस्ट के मशहूर एलजीबीटी कार्यकर्ता तक अदालत पहुंचे थे और चेतावनी दी थी कि जब तक उन्हें देश के दूसरे नागरिकों के समान अधिकार और दर्जा नहीं मिल जाता तब तक वे रुकने वाले नहीं हैं। यह संविधान द्वारा दिए गए वचनों के प्रति इन लोगों के भरोसे को बता रहा था और यही भरोसा न्याय की उम्मीद में इन्हें अदालत तक लेकर गया था।

संपूर्ण नागरिकता हासिल करने के लिए हमें लंबा रास्ता तय करना है। संपूर्ण नागरिकता में सामाजिक और नागरिक अधिकार भी शामिल होंगे, संयुक्त बैंक खाते के लिए या मकान के लिए लीज या साथी के साथ शादी के लिए आवश्यक अधिकार भी इसी में आएंगे। फैसला आने के बाद में हमें कई नई बाधाओं का सामना करना पड़ा है, जैसे सरोगेसी विधेयक और ट्रांसजेंडर विधेयक जिनकी अभी अधिसूचना जारी नहीं हुई है। जैसे ही हम संपूर्ण नागरिक अधिकारों को हासिल करने की दिशा में बढ़ना शुरू करते हैं तो हमें जौहर मामले में अदालत के विधिशास्त्र से मिलने वाले अध्यायों पर गौर फरमाना चाहिए कि किस तरह से भारत में आज बदलाव के लिए संविधान का उपयोग किया जाना चाहिए। इसकी प्रशंसा के लिए हम संविधान की उत्पत्ति से इसकी शुरुआत करते हैं।

भारत का संविधान विशिष्ट है। सन 1946 से 1949 के बीच तैयार किए गए इस संविधान में एक नए देश का ध्यान रखा गया था।

कल्पना थी कि यह नया देश जाति व्यवस्था जैसी चली आ रहीं सामाजिक भेदभाव वाली बुराइयों को खत्म करेगा। भारत का संविधान इस अर्थ में भी अद्वितीय है कि यह उन ऐतिहासिक गलतियों और भेदभावों को सुधारने की बात करता है जिनकी वजह से हाशिए पर पड़े समुदायों का वर्तमान और भविष्य टिका है। इसके ठीक उलट, अमेरिका का संविधान है जो दास प्रथा के सुधार की न तो कोई बात करता है न उसमें कोई माफी मांगी गई है। जौहर के मामले की सुनवाई करने वाली अदालत हमारे संविधान और उसके निर्माताओं की भावनाओं और उम्मीदों से भलीभांति परिचित थी। इसलिए उसने अपना फैसला बहुसंख्यकवाद के मुकाबले और संविधान की नैतिकता की अहम संवैधानिक अपेक्षाओं पर केंद्रित रखा। ये अपेक्षाएं क्या हैं? और ये पूरे भारत के लिए प्रासंगिक क्यों हैं सिर्फ अनोखे भारत को छोड़ कर?

दरअसल, प्रति-बहुसंख्यकवाद अदालतों द्वारा बाहुबली बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों पर अत्याचार रोकने के लिए अपनाई जाने वाली भूमिका है। संवैधानिक नैतिकता संविधान की नैतिकता है, जो सबके लिए समानता, गैर-भेदभाव और स्वतंत्रता के प्रमुख मूल्य हैं। प्रति-बहुसंख्यकवाद और संवैधानिक नैतिकता दोनों का ही मूल डा. आंबेडकर की दूरदृष्टि में निहित था जो संविधान के जरिए निचली जातियों के प्रति ऐतिहासिक भेदभाव को खत्म करना चाहते थे। जातिगत भेदभाव को खत्म करने की हमारी संवैधानिक वचनबद्धता का तात्पर्य यह है कि कई सालों से हमारी अदालतें उस बहुसंख्यकवादी सामाजिक नैतिकता के खिलाफ अपनी भूमिका निभाती आ रही हैं जो जातिगत व्यवस्था को बनाए रखने का पक्षधर है। बहुसंख्यकों की नैतिकता के खिलाफ जाने की यह न्यायिक भूमिका संवैधानिक नैतिकता को बचाती है और यही एलजीबीटी नागरिकों को संरक्षण के लिए अदालत ले जाती है। और जब नागरिकों के समूहों के मौलिक अधिकारों के हनन की बात आई तो अदालत अपनी जिम्मेदारियों से कैसे बच सकती थी।

2016 के शुरू में अंतरजातीय और अंतर-धार्मिक जोड़ों को संवैधानिक सुरक्षा ने हम वकीलों को यौन साथी के अधिकार- जौहर की इस प्रमुख दलील को तैयार करने के लिए प्रेरित किया। इसका पता एलजीबीटी भारतीयों समेत सबके लिए साथी के अधिकार के अदालत के फैसले में चलता है। इससे पता चलता है कि हम एक-दूसरे की आजादी से मजबूत होते हैं और नागरिकों के किसी भी समूह के लिए सरकार या सत्ता द्वारा तय किए जाने वाले भेदभाव से कमजोर होते हैं।

जौहर मामले में अदालत का यह निष्कर्ष कि संविधान इस अधिकार की सुरक्षा करता है कि भोजन, परिधान, आदर्श, आस्था या यौनिकता धार्मिक, यौन और राजनीतिक अल्पसंख्यकों के लिए एक संवैधानिक जीवनरेखा है। यदि अल्पसंख्यक और सदियों से भेदभाव का शिकार होते आ रहे समूह मिल कर संवैधानिक मूल्यों को अक्षुण्ण बनाए रखें तो यही वह संवैधानिक रोशनी है जो हमारे मौजूदा राजनीतिक माहौल को जगमगाए रख सकती है। हमारी आजादी खत्तियों में नहीं रहती है, बल्कि वह एक-दूसरे में ही निहित रहती है।

संवैधानिक मुकदमे में हम आजादी और हाशिए पर पड़े एक समूह की गरिमा के अधिकारों को दूसरे तक पहुंचाते हैं, यह तर्क देते हुए कि ये अधिकार हर नागरिक के हैं और उसे मिलने चाहिए। इसी तरह अलग-अलग मौकों पर यह पहचान होनी चाहिए कि जिसमें लोग एक-दूसरे के साथ खड़े हों, हर समूह की आजादी और समानता को सुनिश्चित करें, वे अपने भीतर ही ताकत और जज्बा पैदा करें।

यही वह समय भी है जब लैंगिक, जाति और श्रम जैसे मुद्दों पर भी एलजीबीटी समुदाय को भीतर और बाहर से अपने साथ शामिल किया जाए। इसी तरह, भारत में अलग तरह के इन नागरिकों को यह महसूस करना चाहिए कि एक समाज के खिलाफ उपयोग में लाए गए नेशनल रजिस्टर का विस्तार दूसरों के लिए भी किया जा सकता है। जर्मनी का इतिहास हमें यह सबक देता है। अलग-थलग कर दिए समुदायों में हमारी शक्ति कम हो जाती है लेकिन अगर हम एक रहते हैं तो हमारे संविधान द्वारा दिए गए वचनों को पूरा करने की दिशा में हम संघर्ष के लिए आगे बढ़ने की क्षमता को हासिल कर लेते हैं।

आज के दौर के भारत में सामाजिक ताने-बाने को उधेड़ना और भेदभाव का सामान्यीकरण करने की प्रवृत्ति भाईचारे, समानता और गरिमा के संवैधानिक मूल्यों को ध्वस्त करने वाली है। इससे खुद संविधान भी कमजोर होता चला जाएगा। संविधान को तैयार करने वालों का दर्शन अब भी बहुतों के लिए उम्मीद की तरह है। …. संविधान का भारत हम सबको इस योग्य बनाता है कि हम अपने मन की बात कह सकें, अपनी आवाज तेज कर सकें और हमारी अपेक्षाओं को शक्ति मिले। …आज हम इसी दर्शन का सम्मान करते हैं। हमें इसी दर्शन का बचाव करना चाहिए।