होर्मुज में तेल के बाद अब ‘डिजिटल ब्लॉक’! अंडरवाटर केबल के लिए टैक्स वसूलेगा ईरान

ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले डिजिटल डेटा पर टैक्स लगाने की योजना बनाई है। $10 ट्रिलियन के दैनिक वित्तीय डेटा पर नियंत्रण और केबल काटने की धमकी ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है।

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में वर्तमान में एक दोहरी नाकाबंदी की स्थिति बनी हुई है, जिसने वैश्विक भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था में हलचल पैदा कर दी है। एक ओर ईरान का इस रणनीतिक जलमार्ग पर कड़ा नियंत्रण है, जिसकी अनुमति के बिना यहां से किसी भी जहाज का गुजरना लगभग असंभव है। दूसरी ओर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाया गया ब्लॉकेड प्रभावी है, जिसके कारण ईरानी जहाज इस मार्ग से अपना तेल निर्यात करने में असमर्थ हैं। तेल की बिक्री न कर पाने के कारण ईरान को भारी आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ रहा है और इस वित्तीय घाटे की भरपाई के लिए ईरान अब तक होर्मुज से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों से टोल टैक्स वसूल रहा था। हालांकि, अब ईरान ने एक और बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर ली है, जिसे 'डिजिटल ब्लॉक' कहा जा रहा है। ईरान की योजना अब इस जलमार्ग के नीचे से गुजरने वाले डिजिटल डेटा के बदले भी टैक्स वसूलने की है। इसे मुज्तबा का एक ट्रिलियन डॉलर का बड़ा दांव माना जा रहा है, जो वैश्विक इंटरनेट और वित्तीय प्रणाली को प्रभावित कर सकता है।

होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण और टोल टैक्स की रणनीति

होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का भौगोलिक और सामरिक नियंत्रण अत्यंत मजबूत है। मुज्तबा अरब सागर के इस अत्यंत संकरे और महत्वपूर्ण हिस्से को किसी भी कीमत पर अपने प्रभाव से बाहर नहीं होने देना चाहते हैं और ईरान की स्थिति इतनी स्पष्ट है कि वह इस क्षेत्र पर अपने नियंत्रण को बनाए रखने के लिए अमेरिका के साथ दोबारा युद्ध लड़ने की संभावना से भी पीछे नहीं हट रहा है। वर्तमान नियमों के अनुसार, इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों को ईरान की मंजूरी लेनी पड़ती है और उन्हें टोल टैक्स का भुगतान करना पड़ता है। इस टोल टैक्स के माध्यम से ईरान पहले से ही मोटा मुनाफा कमा रहा है, लेकिन अब उसकी नजरें तेल और जहाजों से आगे बढ़कर डिजिटल डेटा पर टिक गई हैं। ईरान का मानना है कि तेल के बाद अब डिजिटल डेटा ही वह जरिया है जिससे उसकी कमाई कई गुना बढ़ सकती है।

डिजिटल डेटा पर टैक्स और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

ईरान की नई योजना के तहत, होर्मुज जलडमरूमध्य के नीचे बिछी फाइबर इंटरनेट केबलों पर शुल्क लगाया जाएगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि जो भी देश या कंपनी इन केबलों के माध्यम से डेटा ट्रांसफर करेगी, उसे ईरान को टैक्स चुकाना होगा। यदि कोई देश या संस्था इस शुल्क का भुगतान करने से इनकार करती है, तो ईरान उसके डेटा ट्रांसफर को रोकने या बाधित करने की क्षमता रखता है। यह कदम यूरोप से लेकर एशिया तक के देशों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है।

ईरान का तर्क है कि चूंकि यह विशाल आर्थिक गतिविधि उसके संप्रभु अधिकार क्षेत्र के भीतर हो रही है, इसलिए उसे इस पर शुल्क वसूलने का पूरा अधिकार है।

अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला और ईरान का दावा

ईरान अपने इस विवादास्पद दावे को पुख्ता करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का सहारा ले रहा है और होर्मुज जलडमरूमध्य की भौगोलिक स्थिति इसे विशेष बनाती है, क्योंकि इसका सबसे संकरा हिस्सा मात्र 39 किलोमीटर चौड़ा है। इसके एक तट पर ओमान है और दूसरे पर ईरान। 5 किलोमीटर का हिस्सा ईरान के अधिकार क्षेत्र में आता है। ईरान अब संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून (UNCLOS) के अनुच्छेद 34 का हवाला दे रहा है। हालांकि यह कानून कहता है कि अंतरराष्ट्रीय नेविगेशन के लिए स्ट्रेट खुला रहना चाहिए और इसे बंद नहीं किया जा सकता, लेकिन ईरान का ध्यान इसके उस हिस्से पर है जो यह स्पष्ट करता है कि जलक्षेत्र, समुद्री तल (Sea Bed) और एयरस्पेस पर उसी देश का नियंत्रण होगा जिसका तट उससे सटा है।

यूरोप और एशिया की बढ़ती चिंताएं और ईरान की 2-चरण की योजना

अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के अनुच्छेद 79 के अनुसार, किसी भी देश के क्षेत्रीय जल में केबल बिछाने के लिए उस देश की पूर्व अनुमति अनिवार्य है। ईरान इसी कानूनी बारीकी का लाभ उठा रहा है। होर्मुज में बिछी केबलों का एक बड़ा हिस्सा ईरान की समुद्री सीमा की जमीन को स्पर्श करता है। यदि ये केबल खराब होती हैं, तो उनकी मरम्मत के लिए भी ईरान की अनुमति की आवश्यकता होगी। ईरान सुरक्षा कारणों का हवाला देकर इस प्रक्रिया में जानबूझकर देरी कर सकता है।

इस योजना से ईरान को न केवल भारी राजस्व प्राप्त होगा, बल्कि वह इन केबलों की भौतिक सुरक्षा और डेटा ट्रांसफर की निगरानी करने में भी सक्षम हो जाएगा।

डिजिटल अर्थव्यवस्था को खतरा और केबल काटने की धमकी

डोनाल्ड ट्रंप की नाकाबंदी का उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था को तोड़ना था, लेकिन ईरान ने होर्मुज के माध्यम से अपनी आय बढ़ाने का एक नया रोडमैप तैयार कर लिया है। यदि ईरान की शर्तें नहीं मानी जाती हैं, तो स्थिति गंभीर हो सकती है और लगभग दो सप्ताह पहले, IRGC से जुड़ी तस्नीम न्यूज एजेंसी ने एक रिपोर्ट में होर्मुज स्ट्रेट में मौजूद इंटरनेट केबलों को काटने की सीधी धमकी दी थी। फारस की खाड़ी के देशों के कम से कम 7 मुख्य संचार केबल इसी मार्ग से गुजरते हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि दुनिया का 97 प्रतिशत से अधिक इंटरनेट ट्रैफिक समुद्र तल पर बिछी फाइबर ऑप्टिक केबलों के माध्यम से ही संचालित होता है। होर्मुज जैसे संकरे मार्ग में इतनी बड़ी संख्या में केबलों का होना इसे डिजिटल अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी बनाता है।

होर्मुज में डिजिटल ब्लैकआउट का संभावित खतरा

ईरान ने टैक्स न मिलने की स्थिति में अरब क्षेत्र में 'डिजिटल ब्लैकआउट' की योजना तैयार की है। होर्मुज केवल तेल का चोक पॉइंट नहीं है, बल्कि यह अंडरवाटर केबल्स का एक वैश्विक केंद्र भी है। इस मार्ग के नीचे से 20 से अधिक प्रमुख केबल गुजरती हैं, जो दुनिया के कुल इंटरनेट ट्रैफिक का 17 से 30 प्रतिशत हिस्सा वहन करती हैं। ये केबल एशिया, यूरोप और मध्य-पूर्व के बीच एक डिजिटल सेतु का काम करती हैं। यदि इन्हें नुकसान पहुंचता है, तो इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ेगा, लेकिन खाड़ी देश सबसे अधिक प्रभावित होंगे।

ईरान की यह धमकी स्पष्ट करती है कि भविष्य का युद्ध केवल मिसाइलों और लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह क्लाउड कंप्यूटिंग और इंटरनेट केबल्स के नियंत्रण पर आधारित होगा।

अरब देशों के सिस्टम पर संकट और प्रमुख केबलों का विवरण

होर्मुज में बिछी केबल लाइनों में चार सबसे महत्वपूर्ण केबल शामिल हैं जो पूरे क्षेत्र की लाइफलाइन हैं। इनमें पहली 'फाल्कन केबल' (Falcon Cable) है जिसकी लंबाई 10,300 किमी है। दूसरी 'TGN गल्फ केबल' (TGN Gulf Cable) है जो 4,500 किमी लंबी है। तीसरी 'GBI ब्रिज केबल' (GBI Bridge Cable) है जिसकी लंबाई 10,000 किमी है, और चौथी 'IMEWE केबल' है जो 12,000 किमी तक फैली हुई है। ये केबल पूरे खाड़ी क्षेत्र को यूरोप और एशिया से जोड़ती हैं। यदि ईरान इन पर हमला करता है या इन्हें काट देता है, तो अरब देशों का बैंकिंग और बिजनेस सेक्टर पूरी तरह ठप हो सकता है। ईरान पेमेंट इंटरफेस और इंटरनेट को ब्लॉक करके पूरे सिस्टम को पंगु बना सकता है। चूंकि मरम्मत के लिए भी ईरान की अनुमति अनिवार्य होगी, इसलिए अरब और यूरोपीय देशों के पास ईरान की शर्तों को मानने के अलावा बहुत कम विकल्प बचेंगे।