अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया की भू-राजनीति में अपना पूर्ण दबदबा बनाने के लिए जाने जाते हैं। उनकी हमेशा यही कोशिश रहती है कि दूसरे देशों की सरकारें और नीतियां पूरी तरह से अमेरिकी हितों के मुताबिक काम करें। इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए वह कभी दूसरे देशों पर भारी टैरिफ लगाने की सीधी धमकी देते हैं, तो कभी अन्य देशों के चुनावी घटनाक्रमों और बड़े नेताओं पर खुलकर अपनी व्यक्तिगत और राजनीतिक राय रखते हैं। लेकिन, पिछले दो साल में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से सामने आए चुनावी नतीजे उनके लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित हुए हैं। एक बड़े दावे के अनुसार, ट्रंप ने पिछले दो साल में कुल आठ देशों के चुनावों में अपने पसंदीदा उम्मीदवारों या राजनीतिक पक्षों का खुलकर और पूरा समर्थन किया, लेकिन विडंबना यह रही कि उनमें से छह देशों में उनके समर्थित पक्षों को करारी हार का सामना करना पड़ा।
आठ देशों के चुनावी परिणामों का विश्लेषण
इन आठों देशों के चुनावों को लेकर ट्रंप या उनके करीबी सहयोगियों और समर्थकों ने अपनी पसंद खुलकर जाहिर की थी। उपलब्ध और दिए गए आंकड़ों के अनुसार, केवल जापान और होंडुरास में ही उनके समर्थित पक्षों को जीत हासिल हो सकी, जबकि बाकी छह देशों में उनके पसंदीदा नेताओं और दलों को निराशा हाथ लगी। इन सभी बड़े चुनावी परिणामों ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में एक बहुत बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता और वैश्विक अमेरिकी ताकत अब दूसरे देशों के मतदाताओं को पहले की तरह प्रभावित करने में सक्षम नहीं रह गई है? क्या दुनिया भर के मतदाता अब अमेरिकी दबाव या समर्थन को एक नकारात्मक रूप में देखने लगे हैं? इन तमाम सवालों के जवाब तलाशने के लिए हमें उन छह देशों के चुनावों पर गहराई से नजर डालनी होगी जहाँ ट्रंप के समर्थकों को हार का मुंह देखना पड़ा है।
कनाडा में कंजर्वेटिव पार्टी को मिली हार
कनाडा का चुनाव अप्रैल 2025 में संपन्न हुआ था। इस चुनाव में ट्रंप की नीतियों के बेहद करीब माने जाने वाले कंजर्वेटिव पार्टी के नेता पियरे पोइलिवर चुनाव मैदान में थे, जिन्हें ट्रंप का मौन और वैचारिक समर्थन प्राप्त था। लेकिन इस चुनाव में मार्क कार्नी की लिबरल पार्टी ने शानदार जीत दर्ज की और पियरे पोइलिवर को हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव के दौरान ट्रंप की तरफ से लगातार दी जाने वाली टैरिफ धमकियों और कनाडा को अमेरिका में मिलाने संबंधी बयानों से वहां के नागरिकों के बीच एक गहरा राष्ट्रीय स्वाभिमान पैदा हुआ, जो अंततः चुनाव में सबसे अहम और निर्णायक मुद्दा बन गया। कनाडाई मतदाताओं ने अमेरिकी हस्तक्षेप और धमकियों के खिलाफ जाकर मतदान किया, जिससे ट्रंप समर्थित राजनीति को बड़ा झटका लगा।
ऑस्ट्रेलियाई चुनाव में लेबर पार्टी की जीत
ऑस्ट्रेलिया में मई 2025 में हुए आम चुनाव में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। यहाँ ट्रंप जैसी दक्षिणपंथी और आक्रामक नीतियों से जुड़े माने जाने वाले कंजर्वेटिव नेता पीटर डटन चुनाव हार गए, जबकि एंथनी अल्बनीज की लेबर पार्टी ने शानदार जीत हासिल की और चुनाव के बाद आए इलेक्शन एनालिसिस में यह बात खुलकर सामने आई कि ट्रंप के टैरिफ और उनकी एकतरफा नीतियों के प्रति ऑस्ट्रेलियाई जनता में भारी नाराजगी थी, जिसे विपक्षी नेताओं ने अपने पक्ष में भुनाया। पीटर डटन को ट्रंप की शैली का नेता माना जा रहा था, और जनता ने इस शैली को सिरे से खारिज कर दिया।
रोमानिया और हंगरी में राष्ट्रवादी नेताओं की पराजय
रोमानिया में मई 2025 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की एमएजीए यानी मेक अमेरिका ग्रेट अगेन विचारधारा के कट्टर समर्थक राष्ट्रवादी नेता जॉर्ज सिमियोन राष्ट्रपति चुनाव हार गए। उन्हें उनके विरोधी निकुशोर दान ने करारी शिकस्त दी। चुनाव परिणामों के अनुसार निकुशोर दान को करीब 54 प्रतिशत वोट हासिल हुए, जिससे रोमानिया में अमेरिकी राष्ट्रवादी सोच की पैरोकार राजनीति को तगड़ा झटका लगा। इसके अलावा हंगरी में भी ऐसा ही वाकया सामने आया जहाँ अप्रैल 2026 के चुनाव में ट्रंप के बेहद करीबी सहयोगी और लंबे समय से देश के प्रधानमंत्री रहे विक्टर ओर्बन को पीटर मग्यार के नेतृत्व वाली विपक्षी पार्टी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने ओर्बन का खुलकर समर्थन किया था और अमेरिकी प्रशासन के ताकतवर पदाधिकारी एवं उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी चुनाव से ठीक पहले हंगरी के दौरे पर गए थे ताकि ओर्बन की स्थिति मजबूत हो सके। तमाम अमेरिकी कोशिशों के बावजूद विक्टर ओर्बन अपनी सत्ता बरकरार नहीं रख सके और विपक्षी नेता ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया।
ब्राजील और जर्मनी में भी ट्रंप समर्थित ताकतों को असफलता
ब्राजील के राजनीतिक परिदृश्य में भी अक्टूबर 2026 के दौरान अमेरिकी दखलंदाजी स्पष्ट रूप से देखी गई। ब्राजील में अमेरिकी ट्रंप प्रशासन से जुड़े उच्चाधिकारियों ने बोल्सोनारो परिवार की देश की सत्ता में फिर से वापसी के लिए पर्दे के पीछे से और खुलकर बहुत कोशिशें कीं। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने मौजूदा राष्ट्रपति लुई इनैसियो लूला डा सिल्वा पर भारी राजनीतिक दबाव बनाने और उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी तथा बोल्सोनारो परिवार के सदस्य फ्लावियो बोल्सोनारो को फायदा पहुंचाने वाले कदमों की पुरजोर पैरवी की थी। लेकिन तमाम अमेरिकी दबाव के बावजूद पच्चीस अक्टूबर 2026 को हुए महत्वपूर्ण राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्रपति लूला ने फ्लावियो बोल्सोनारो को स्पष्ट रूप से हरा दिया। उधर जर्मनी में फरवरी 2025 के आम चुनाव में ट्रंप के अति करीबी और चर्चित सहयोगी अरबपति कारोबारी एलन मस्क ने दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी और उसकी प्रमुख नेता एलिस वाइडेल का खुलकर समर्थन किया था। इसके बावजूद तेईस फरवरी 2025 को संपन्न हुए जर्मन आम चुनाव में एएफडी पार्टी पहले स्थान पर नहीं पहुंच सकी। 8%) वोट मिले और वह दूसरे स्थान पर संतोष करने को मजबूर हुई, जबकि फ्रेडरिक मर्ज के नेतृत्व वाले सीडीयू और सीएसयू गठबंधन ने सबसे ज्यादा वोट हासिल करके अपनी स्थिति मजबूत की।
जापान और होंडुरास में ट्रंप समर्थित उम्मीदवारों को कैसे मिली सफलता
जहाँ एक तरफ दुनिया के अधिकांश देशों में ट्रंप के समर्थन को जनता ने खारिज कर दिया, वहीं दूसरी तरफ जापान और होंडुरास ऐसे दो देश रहे जहाँ उनके समर्थित पक्षों को अप्रत्याशित सफलता हासिल हुई। जापान में प्रधानमंत्री साने ताकाइची की पार्टी ने फरवरी 2026 के आम चुनाव में एक बहुत बड़ी जीत हासिल की। मतदान से ठीक पहले छह फरवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ताकाइची और उनके राजनीतिक गठबंधन का खुलकर समर्थन किया था और ट्रंप ने साने ताकाइची को एक बेहद मजबूत, सख्त और समझदार नेता बताते हुए सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह जापान के लोगों को बिल्कुल भी निराश नहीं करेंगी। अपने इस समर्थन के दौरान ट्रंप ने जापान के साथ अमेरिका के मजबूत व्यापारिक और रणनीतिक सुरक्षा संबंधों का भी विशेष रूप से जिक्र किया था, जिसका असर जापानी मतदाताओं पर सकारात्मक रूप से पड़ा। दूसरी तरफ सेंट्रल अमेरिका के छोटे देश होंडुरास में भी ट्रंप की रणनीति सफल होती दिखी। वहाँ राष्ट्रपति पद के चुनाव में उम्मीदवार नासरी असफुरा का ट्रंप ने चुनाव से कुछ ही दिन पहले जोरदार सपोर्ट किया था। ट्रंप ने यहाँ तक संकेत दे डाला था कि अगर नासरी असफुरा चुनाव नहीं जीतते हैं, तो भविष्य में होंडुरास को मिलने वाली अमेरिकी आर्थिक मदद पर गंभीर असर पड़ सकता है। जब वोटों की गिनती चल रही थी, तब ट्रंप ने चुनाव के नतीजे बदलने की कोशिश किए जाने का गंभीर आरोप भी लगाया, हालांकि इसके समर्थन में उन्होंने कोई पुख्ता सबूत जनता के सामने पेश नहीं किया। आखिरकार चौबीस दिसंबर 2025 को होंडुरास के चुनाव अधिकारियों ने नासरी असफुरा को आधिकारिक तौर पर विजेता घोषित कर दिया। इन मिले-जुले परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि अमेरिकी प्रभाव अब अंधाधुंध काम नहीं करता, बल्कि क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दे ही चुनावी हार-जीत की असल दिशा तय कर रहे हैं।
