ऊर्जा संकट का गहराता साया: ईरान जंग के बीच दुनिया भर में लगीं कड़ी पाबंदियां, जानें भारत का हाल

28 फरवरी को शुरू हुई ईरान जंग और होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से दुनिया में भीषण ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। तेल और गैस की कमी के कारण भारत, पाकिस्तान, अमेरिका और यूरोप सहित 60 से अधिक देशों ने ईंधन बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम, निर्यात प्रतिबंध और सब्सिडी कटौती जैसे कड़े कदम उठाए हैं।

28 फरवरी को शुरू हुई ईरान जंग और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के बाद, संपूर्ण विश्व अब तक के सबसे बड़े और गंभीर ऊर्जा संकट की दहलीज पर खड़ा है। तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित होने के कारण दुनिया के विभिन्न देशों में महंगाई का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है, विमानों की उड़ानों में कटौती की जा रही है और सरकारों को अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अत्यंत कठोर और अप्रत्याशित फैसले लेने पड़ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी है कि यह इतिहास का सबसे बड़ा वैश्विक ऊर्जा संकट बनता जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर के 60 से अधिक देशों ने अब तक लगभग 200 ऐसी नीतियां और नियम लागू किए हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य ईंधन की बचत करना और आम जनता पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करना है।

भारत की रणनीति और प्रधानमंत्री की अपील

इस वैश्विक संकट के बीच भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को देश की जनता से सीधे संवाद करते हुए कई महत्वपूर्ण अपीलें की हैं और प्रधानमंत्री ने नागरिकों से आग्रह किया है कि वे ईंधन के इस्तेमाल में यथासंभव कटौती करें और अनावश्यक विदेश यात्राओं को फिलहाल टाल दें। इसके अतिरिक्त, उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए सोना खरीदने पर रोक लगाने, निजी वाहनों के बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अधिक उपयोग करने और कार्यस्थलों पर 'वर्क फ्रॉम होम' की संस्कृति को फिर से अपनाने का सुझाव दिया है। कृषि क्षेत्र के लिए उन्होंने किसानों से केमिकल फर्टिलाइजर्स पर अपनी निर्भरता कम करने और नेचुरल फार्मिंग यानी प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ने का आह्वान किया है। गौरतलब है कि जंग की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें एक समय 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू चुकी हैं, जबकि भारत सहित कई एशियाई देशों ने अपना वार्षिक बजट 70 डॉलर प्रति बैरल की औसत कीमत मानकर तैयार किया था।

घरेलू बाजार में कीमतों की स्थिति और चुनौतियां

भारत सरकार ने आम आदमी को राहत देने के उद्देश्य से पेट्रोल और डीजल की कीमतों को फिलहाल स्थिर रखा है, जिसके लिए सरकार द्वारा भारी सब्सिडी दी जा रही है। हालांकि, इस नीति के कारण देश की तेल कंपनियों को वित्तीय मोर्चे पर भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। देश के लगभग 33 करोड़ घरों में खाना पकाने की गैस (LPG) की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने फर्टिलाइजर प्लांट्स को दी जाने वाली गैस सप्लाई में 30% तक की कटौती कर दी है। संकट की इस घड़ी में भारत के पड़ोसी देशों और अन्य वैश्विक शक्तियों ने भी अपने-अपने स्तर पर कड़े कदम उठाए हैं।

वैश्विक शक्तियों और पड़ोसी देशों के कड़े कदम

पाकिस्तान में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि वहां 4 दिन का वर्क वीक लागू करने के साथ-साथ आधे कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम दिया गया है और शिक्षण संस्थानों को भी दो हफ्ते के लिए बंद करना पड़ा था। वहीं चीन ने अपने घरेलू बाजार में आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए मार्च महीने से ही पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल जैसे रिफाइंड ईंधन और उर्वरकों के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है और इंडोनेशिया ने भी अपनी घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए LNG निर्यात रोक दिया है और B50 बायोडीजल प्रोग्राम (50% पाम ऑयल मिश्रण) को तेजी से बढ़ावा दे रहा है। बांग्लादेश में ईंधन खरीद की सीमा तय कर दी गई है और ऑयल डिपो की सुरक्षा के लिए सेना तैनात की गई है, वहां LPG की कीमतें 900 टका से बढ़कर 1500 टका हो गई हैं, जिससे गारमेंट इंडस्ट्री का उत्पादन 40% तक गिर गया है।

नेपाल, अमेरिका और यूरोप की वर्तमान स्थिति

1 किलो गैस ही भरी जाएगी ताकि स्टॉक लंबे समय तक चल सके। 29 करोड़ बैरल प्रतिदिन कर दिया है, लेकिन वहां भी घरेलू स्तर पर कीमतें बढ़ने से स्पिरिट एयरलाइंस जैसी कंपनियों को अपना परिचालन बंद करना पड़ा है। अमेरिका ने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए अपने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) से 172 मिलियन बैरल तेल रिलीज करने का निर्णय लिया है। यूरोप में भी स्थिति चिंताजनक है, जहां खाड़ी देशों से जेट फ्यूल मिलना बंद होने के बाद अमेरिका पर निर्भरता बढ़ी है। जर्मनी और इटली सहित 8 यूरोपीय देशों ने अपने कोयला संयंत्रों को बंद करने की योजना को फिलहाल टाल दिया है।

आर्थिक प्रभाव और भविष्य की चेतावनी

9 लाख करोड़ रुपये) का भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है। इस संकट की वजह से क्षेत्र के लगभग 88 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट को जल्द ही यातायात के लिए नहीं खोला गया, तो आने वाले समय में ईंधन और बिजली के साथ-साथ इंटरनेट, खाद और परिवहन सेवाओं की लागत में और भी अधिक वृद्धि देखी जा सकती है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा साबित होगा।