अमेरिकी वर्चस्व का अंत? पुतिन, जिनपिंग और खामेनेई के चक्रव्यूह में फंसे डोनाल्ड ट्रंप

रूस, चीन और ईरान के बढ़ते गठजोड़ ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीतियों को विफल कर दिया है। यूक्रेन और ईरान के मोर्चों पर अमेरिका का दबदबा खत्म हो रहा है, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव आया है और ट्रंप की लोकप्रियता गिर रही है।

दुनिया के राजनीतिक मंच पर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहाँ दशकों से चला आ रहा अमेरिकी वर्चस्व अब खात्मे की कगार पर पहुँचता दिख रहा है और इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में तीन शक्तिशाली चेहरे हैं, जिन्होंने दो अलग-अलग मोर्चों को न केवल एक जंग में तब्दील कर दिया है, बल्कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक ऐसे बारूदी भंवर में फंसा दिया है जिससे निकलना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है। ट्रंप ईरान पर बार-बार हमले की धमकी तो दे रहे हैं, लेकिन वे कार्रवाई करने से हिचकिचा रहे हैं। इसके पीछे की मुख्य वजह ईरान द्वारा रूस और चीन के साथ मिलकर पर्दे के पीछे बिछाया गया वह जाल है, जिसने ट्रंप की हर रणनीति को विफल कर दिया है। ट्रंप का कहना है कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं हो सकते, लेकिन जमीनी हकीकत उनकी धमकियों से अलग नजर आ रही है।

तीन चेहरे और दो मोर्चों की रणनीति

अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने वाले इन तीन चेहरों में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई शामिल हैं। इन तीनों नेताओं ने मिलकर यूक्रेन और ईरान के मोर्चों को एक साझा युद्ध क्षेत्र बना दिया है। ट्रंप और उनकी टीम इस वैश्विक रणनीति को समझने में पूरी तरह नाकाम रही है। परिणाम यह हुआ है कि दुनिया पर अमेरिका की पकड़ धीरे-धीरे ढीली पड़ती जा रही है। अब स्थिति यह है कि ट्रंप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को भी खुलवाने में असमर्थ नजर आ रहे हैं और ईरान के सामने उनकी हर धमकी बेअसर साबित हो रही है। 40 दिनों की जंग का परिणाम यह हुआ है कि अमेरिका का जो खौफ दुनिया में था, वह अब लगभग समाप्त हो चुका है।

रूस और ईरान का खुफिया गठबंधन

इस युद्ध में रूस और ईरान के बीच का तालमेल अमेरिका के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गया है। अमेरिका को नुकसान पहुँचाने के लिए रूस लगातार ईरान को खुफिया जानकारी (इंटेलिजेंस) दे रहा है। इसके बदले में ईरान रूस को शाहेद ड्रोन की आपूर्ति कर रहा है, जिनका उपयोग रूस यूक्रेन की धरती पर हमले करने के लिए कर रहा है। पेंटागन की एक रिपोर्ट के अनुसार, रूस से मिली खुफिया जानकारी की मदद से ईरानी कमांडरों ने अमेरिकी हमलों के पैटर्न को पूरी तरह समझ लिया है। अब ईरान को यह पता है कि अमेरिकी फाइटर जेट किस रास्ते से आते हैं, कितनी ऊंचाई पर उड़ते हैं और उनके हमले का तरीका क्या होता है। इस जानकारी की वजह से ईरान अब न केवल अमेरिकी हमलों का अंदाजा लगा सकता है, बल्कि उन्हें नाकाम करने में भी सक्षम हो गया है।

चीन की भूमिका और हथियारों की सप्लाई

अमेरिका की मुश्किलें बढ़ाने में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी पीछे नहीं हैं। चीन न केवल रूस को बल्कि ईरान को भी हथियार बनाने के लिए जरूरी पुर्जों की सप्लाई कर रहा है। चीन की इसी मदद की वजह से रूस और ईरान बहुत तेजी से अपने हथियारों का जखीरा तैयार कर रहे हैं। जहाँ ईरान खतरनाक हथियारों का भंडार बना रहा है, वहीं रूस इन हथियारों का इस्तेमाल यूक्रेन में कर रहा है। पुतिन, जिनपिंग और मुज्तबा ने मिलकर जो चक्रव्यूह तैयार किया है, उसमें ट्रंप लगातार धंसते जा रहे हैं। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का कहना है कि वे ऐसी कोई डील नहीं करेंगे जिससे ईरान को परमाणु हथियार मिले, लेकिन हकीकत में अमेरिका का दबदबा अब पहले जैसा नहीं रहा।

ट्रंप की गिरती रेटिंग और घरेलू विरोध

ईरान के साथ चल रही इस तनातनी और युद्ध जैसी स्थिति की वजह से अमेरिका के भीतर ही ट्रंप का विरोध शुरू हो गया है। ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग लगातार गिरती जा रही है। अमेरिका के लोगों का मानना है कि ईरान के साथ इस संघर्ष में अमेरिका की जीत नहीं बल्कि हार हुई है। ट्रंप ने हमला करके ईरान को अपनी सैन्य ताकत दिखाने का मौका दे दिया है, जिससे ईरान का डर खत्म हो गया है। इसके अलावा, ट्रंप ने नाटो और यूरोपीय देशों के साथ भी अपने रिश्ते खराब कर लिए हैं, जिसकी वजह से ईरान के मोर्चे पर कोई भी ताकतवर देश अमेरिका के साथ खड़ा नजर नहीं आ रहा है। इस स्थिति ने उत्तर कोरिया जैसे देशों के हौसले भी बढ़ा दिए हैं और किम जोंग उन भी अब अमेरिका को चुनौती देने से पीछे नहीं हट रहे हैं।

वैश्विक शक्ति संतुलन में ऐतिहासिक बदलाव

यूक्रेन युद्ध की आग भी ट्रंप के आने के बाद शांत नहीं हुई है और पुतिन, जेलेंस्की और यूरोपीय देश ट्रंप की शर्तों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। रूस सैन्य ताकत के जरिए यूक्रेन में अपने सभी लक्ष्यों को पूरा करने पर अड़ा हुआ है। कई दशकों में यह पहली बार है जब दुनिया के कई देश एक साथ अमेरिका की बात मानने से इनकार कर रहे हैं। यूक्रेन से लेकर वेनेजुएला और ईरान तक ट्रंप द्वारा उठाए गए कदम उनके लिए ही उल्टे पड़ते दिख रहे हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि सुपरपावर अमेरिका की साख पर गहरा बट्टा लगा है और दुनिया में एक नया शक्ति संतुलन स्थापित हो रहा है, जहाँ अमेरिका की भूमिका सीमित होती जा रही है।