एजुकेशन / यह है राजस्थान का वह अनूठा शिक्षक, जिसने स्कूल बस्ते का बोझ कम करने का प्रोजेक्ट बनाया

Zoom News : Sep 04, 2019, 05:17 PM
ज्ञानकोष 2007 में तैयार करना शुरू किया था जालोर के युवा शिक्षक संदीप जोशी ने। भारत दर्शन गलियारा और स्वास्थ्य गलियारा जैसे नौ प्रोजेक्ट तैयार कर चुके संदीप पन्द्रह साल से जालोर में शिक्षक हैं। जालोर साक्षरता में राजस्थान का सबसे पिछड़ा जिला है। संदीप को अपने नवाचारों के लिए उप राष्ट्रपति के हाथों सम्मान भी मिल चुका है। राजस्थान की राज्य सरकार ने बस्ते का बोझ करने की दिशा में शिक्षक दिवस से एक दिन पहले यह नवाचार पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया है। सरकार संदीप की इस साधना को कितना सम्मान देगी यह तो पता नहीं, लेकिन उनका कहना है कि यह सपना पूरा होने की दिशा में एक कदम है। क्रेडिट लेना तो इश्यू ही नहीं था। कार्य अंजाम तक पहुंच जाए, वही बहुत है। 
कंधे पर भारी-भरकम बस्ते का बोझ, एक हाथ में पानी की बोतल और दूसरे हाथ में लंच बाक्स लिए धीमी गति से थके-थके से चलते पाँव। मासूम चेहरों को ऐसी स्थिति में देखकर पीड़ा होती है। हम उसे सभ्य, सुसंस्कृत, सुयोग्य नागरिक बनने की शिक्षा दे रहे हैं या केवल कुशल भारवाहक बनने का प्रशिक्षण। भारी-भरकम बस्ते के बोझ तले पिसता बचपन अभिभावकों व स्कूल की उच्च अपेक्षाओं की बलि चढ़ रहा है। बाल सुलभ जीवन चर्या के विपरीत उसका जीवन तनावपूर्ण हो रहा है। यह मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों व शिक्षाविदों के लिए भी चिंता का कारण बना है।
संदीप बताते हैं कि एक शिक्षक होने के नाते पिछले कई वर्षों से मेरा मन इस समस्या के इर्द-गिर्द चक्कर लगा रहा था। वर्ष 2007 में मैंने इस समस्या का संभावित सरल, सहज समाधान निकाला और शिक्षक, अभिभावक व शिक्षाविदों ने इसे सकारात्मक उपाय बतलाया है। राजस्थान में शिक्षा निदेशक से लेकर शिक्षा मंत्री तक सभी ने इसे कारगर समाधान बताया। देश-भर में यह समाधान चर्चा और चितंन का विषय बना है। वे कहते हैं कि मैं चाहता हूँ कि बुद्धिजीवियों के बीच भी इन उपायों पर चर्चा हो और सरकार पर इस समाधान को लागू करने का आग्रह बनाया जाए।


नवाचार : राजस्थान में घट गया बच्चों के बस्ते का बोझ, दो तिहाई कम हुआ वजन

क्या है ज्ञानकोष 
यह संकल्पना पाठ्य पुस्तकों के माह आधारित स्वरूप की है। जिसके द्वारा राज्यों के शिक्षा विभाग, प्रारम्भिक शिक्षा परिषद् के पाठ्यक्रम एवं शिक्षण योजना में परिवर्तन किए बिना भी पाठ्य पुस्तकों के बोझ में 86-90 प्रतिशत तक कमी की जा सकती है। साथ ही पुस्तक की गुणवत्ता भी बढ़ाई जा सकती है।
1. अभी पुस्तकें विषय आधारित होती है। सरकारी स्कूल में पुस्तकों की संख्या 5 से 9 तक है। निजी स्कूल में इनकी संख्या 12 से 15 तक हो जाती है।
2. जुलाई में पढ़े हुए पाठ को फरवरी-मार्च तक स्कूल क्यों ले जाना और जो पाठ जनवरी-फरवरी में पढ़ने हैं उन्हें साल भर क्यों ढोना।
3. इन पाठ्य पुस्तकों को माह आधारित किया जाए। एक ही किताब में हिन्दी के दो-तीन पाठ, विज्ञान के सामाजिक के, अंग्रेज़ी के इत्यादि सभी विषयों के दो-तीन पाठों का समावेश हो। इस तरह सभी विषय मिलाकर एक माह की एक ही किताब हो।
4. माह आधारित इन पुस्तकों का नाम ज्ञानकोष दिया। ज्ञानकोष जुलाई, ज्ञानकोष अगस्त .....।
5. यह कठिन नहीं है। वर्तमान में भी पहली कक्षा के बच्चे हिन्दी, गणित, पर्यावरण एक साथ पढ़ते ही हैं।
6. केवल किताबों की बाइंडिंग बदलकर ही यह किया जा सकता है। इससे अनेक फायदे हैं। सबसे बड़ा लाभ बस्ते का बोझ कम। दस-बारह किताबों की जगह एक ही किताब। हर पीरियड में किताब अन्दर-बाहर करने के झंझट से मुक्ति। किताब अधिक समय तक चलेगी इससे आर्थिक लाभ होगा। सब शिक्षकों समय पर पाठ्यक्रम पूरा करना होगा।

इस संकल्पना को और अधिक स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। इसे आधार मान कर कक्षा षष्ठी (छठी) की पाठ्यपुस्तकों को नए स्वरूप में व्यवस्थित करके मॉडल पुस्तकें बनाई गईं जिसे "ज्ञानकोष" नाम दिया गया। इसका आधार विचार Child Friendly Text Book है। 
सत्र भर में 9 अध्यापन माह बनाए गए। वर्तमान व्यवस्था में राजस्थान में नया सत्र अप्रैल के अंत में ही शुरू होता है। 1 अप्रैल-मई 2. जुलाई 3. अगस्त 4. सितम्बर 5. अक्तूबर 6. नवम्बर 7. दिसम्बर 8. जनवरी 9. फरवरी। राजस्थान प्रारंभिक शिक्षा के निर्देशानुसार वर्तमान में मासिक पाठ्यक्रम विभाजन निम्न सारणी के अनुसार है। सारणी में क्षेतिज (आड़ी) पंक्तियों में विषय की मासिक पाठ योजना दी गयी है जिसके अनुसार अध्यापन करवाना निर्धारित हैं।

।। सारणी ।।
सारणी के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि हिन्दी विषय में कुल 29 अध्याय हैं जिनमें से पाठ 1.2.3 का अध्ययन ही उसे अप्रैल-मई माह में करना है। तब पीछे के 26 अध्यायों को उस माह में विद्यालय लेकर आने का कोई अर्थ नहीं है तथा पाठ 1.2.3 को अप्रैल-मई के बाद वर्ष भर लाने का कोई अर्थ नहीं है।
इस सारणी की उर्ध्वाधर पंक्तियाँ (खड़ी पंक्तियाँ) ज्ञानकोष के प्रस्तावित स्वरूप को स्पष्ट करती हैं। सभी विषयों के सारे अध्याय जो अप्रैल-मई माह में अध्यापन करवाए जाने अपेक्षित हैं, को मिलकर ज्ञानकोष माह-अप्रैल मई को निर्माण किया गया है। इस प्रकार हिन्दी के 3 पाठ, सा.ज्ञान के 2 पाठ, विज्ञान 4 पाठ, अंग्रजी के 2 पाठ, संस्कृत के 2 पाठ, गणित की 1 प्रश्नावली, स्वास्थ्य शिक्षा का 1, कला शिक्षा के 2 पाठ एवं कार्यानुभव के 2 अध्याय। कुल 18 अध्यायों की एक पुस्तक विद्यार्थी विद्यालय लेकर आए मस्ती के साथ, कमर सीधी करके, बाकी महीनों की पुस्तकें कक्षा कक्ष की अलमारी या घर पर सुरक्षित रखी जाएगी।
आवश्यकता अनुसार बालक उनका उपयोग कर सकेगा। इसी आधार पर कुल 9 पुस्तकें बनायी है। ज्ञानकोष की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए तथा निजी विद्यालयों की पुस्तकों की संख्या कम करने के लिए इसमें 4 पृष्ठ अतिरिक्त जोड़े गए हैं। जिनमें प्रतिमाह सामान्य ज्ञान के 10 प्रश्न, नैतिक शिक्षा एवं व्यक्ति विकास के बिन्दु, प्रतिमाह एक संस्कार गीत व पूरे माह की गृहकार्य दैनन्दिनी सम्मिलित की गई है। इसी प्रकार कक्षा 6 के मासिक ज्ञानकोष में गुणवत्ता वृद्धि जोड़े गए अतिरिक्त अध्याय। प्रत्येक माह की पुस्तक के प्रारम्भ में पूर्व ज्ञान का स्मरण करवाने के लिए संबंधित स्मरणीय तथ्यों का समावेश 1-2 पृष्ठ में किया जाना अधिक उपयोगी है।

नोट: प्राथमिक कक्षाओं के पुस्तकों की रचना निम्न अनुसार की जा सकती है।
ज्ञानकोष प्रथम - प्रथम परख तक (जुलाई अगस्त माह)
ज्ञानकोष द्वितीय - द्वितीय परख तक (सितम्बर अक्टबर माह)
ज्ञानकोष तृतीय - अर्द्धवार्षिक परीक्षा तक (नवम्बर दिसम्बर माह)
ज्ञानकोष चतुर्थ - वार्षिक परीक्षा तक (जनवरी फरवरी मार्च माह)

ज्ञानकोष के कुछ प्रमुख फायदे इस प्रकार हैं:
1 बस्ते के बोझ में कमी पुस्तकों का वजन 80% तक कम 
2 अन्य उपयोगी जानकारियाँ जोड़कर पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता में वृद्धि
3 पुस्तक की आयु में वृद्धि, 
4 पर्यावरण संरक्षण
5 आर्थिक दृष्टि से सरकार  व अभिभावकों के लिए बचत। पुस्तके मासिक होने के कारण कम फटेगी , निशुल्क पाठ्यपुस्तक वितरण  योजना में 2 वर्ष तक भी काम में ली जा सकती है ।
निजी विद्यालयों में पुस्तकों की संख्या बहुत अधिक होती है माह-आधारित होने पर पुस्तकों की संख्या अधिकतम 9 अथवा 10 ही रहेगी , अभिभावक की जेब पर सीधे-सीधे राहत हैं ।
6 लिखित कार्य के प्रति विद्यार्थियों और शिक्षकों की गंभीरता बढ़ेगी ।
7 एक ही पुस्तक में सारे विषय होने से विद्यार्थियों की रोचकता भी बढ़ेगी और वे सारे ज्ञान का अंतर्संबंध समझ पाएंगे
इस प्रकार, निर्धारित पाठ्यक्रम का पालन करते हुए भी बस्ते का बोझ कम किया जा सकता है।
यह प्रयास संदीप जोशी ने 2007 में शुरू किया और उसे कई मंत्रियों और सरकारों ने सराहा, लकिन पूरे अंजाम तक पहुंचने में अभी काफी समय शेष है और उसके लिए सभी के समन्वित प्रयासों की जरूरत है।