धर्म / मोहर्रम 2019: कब है मोहर्रम? क्या है इसका महत्व

Dainik Jagran : Sep 09, 2019, 05:08 PM

मोहर्रम 2019: इस्लामिक नए साल के पहले महीने में मुस्लिम समुदाय मुहर्रम मनाता है। हालांकि, ये त्योहार नहीं होता इसलिए इस दिन खुशी की जगह ग़म मनाया जाता है इसलिए इसे ग़म का महीना भी कहा जाता है। मोहर्रम को इमाम हुसैन और उनके अनुयायियों की शहादत की याद में मातम की तरह मनाया जाता है। पूरी दुनिया के मुस्लिम समुदाय के लोग मुहर्रम के 9वें और 10वें दिन रोज़ा रखते हैं और ताज़िए भी निकाले जाते हैं। 

 कब है मुहर्रम

इस साल मुहर्रम 10 सितंबर को मनाया जाएगा। यह इस्लामिक नए साल का पहला पर्व भी होता है। मोहर्रम की 10वीं तारीख को ताज़िया जुलूस निकाला जाता है। ताज़िया लकड़ी और कपड़ों से गुंबदनुमा बनाया जाता है। ताज़िए में हज़रत इमाम हुसैन की मकबरे की नकल भी बनाई जाती है। इसे एक झांकी की तरह सजाते हैं और एक शहीद की अर्थी की तरह इसका सम्मान करते हुए कर्बला तक ले जाते हैं। 

मोहर्रम क्या है 

'मोहर्रम' इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने का नाम है। इसी महीने से इस्लाम का नया साल शुरू होता है। इस महिने की 10 तारीख को रोज-ए-आशुरा (Day Of Ashura) कहा जाता है, इसी दिन को अंग्रेजी कैलेंडर में मोहर्रम कहा गया है।

इसलिए मनाया जाता है मोहर्रम

मोहर्रम के महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयाइयों का कत्ल कर दिया गया था। हजरत हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे।

इस वजह से थी यजीद से नाइत्तेफाकी

इस्लाम में सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करने के लिए कहा गया है। छल-कपट, झूठ, मक्कारी, जुआ, शराब, जैसी चीजें इस्लाम में हराम बताई गई हैं। हजरत मोहम्मद ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया और इन्हीं इस्लामिक सिद्घान्तों पर अमल करने की हिदायत सभी मुसलमानों और अपने परिवार को भी दी।

दूसरी तरफ इस्लाम का जहां से उदय हुआ, मदीना से कुछ दूर 'शाम' में मुआविया नामक शासक का दौर था। मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में यजीद, जिसमें सभी अवगुण मौजूद थे, वह शाम की गद्दी पर बैठा। यजीद चाहता था कि उसके गद्दी पर बैठने की पुष्टि इमाम हुसैन करें क्योंकि वह मोहम्मद साहब के नवासे हैं और उनका वहां के लोगों पर उनका अच्छा प्रभाव है।

यजीद जैसे शख्स को इस्लामी शासक मानने से हजरत मोहम्मद के घराने ने साफ इंकार कर दिया था क्योंकि यजीद के लिए इस्लामी मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी। यजीद की बात मानने से इनकार करने के साथ ही उन्होंने यह भी फैसला लिया कि अब वह अपने नाना हजरत मोहम्मद साहब का शहर मदीना छोड़ देंगे ताकि वहां अमन कायम रहे।

ऐसे शुरू हुई जंग

इमाम हुसैन हमेशा के लिए मदीना छोड़कर परिवार और कुछ चाहने वालों के साथ इराक की तरफ जा रहे थे। लेकिन करबला के पास यजीद की फौज ने उनके काफिले को घेर लिया। इमाम जंग का इरादा नहीं रखते थे क्योंकि उनके काफिले में केवल 72 लोग शामिल थे। जिसमें छह माह का बेटा उनकी बहन-बेटियां, पत्नी और छोटे-छोटे बच्चे शामिल थे। यह तारीख एक मोहरर्म थी, और गर्मी का वक्त था। गौरतलब हो कि आज भी इराक में (मई) गर्मियों में दिन के वक्त सामान्य तापमान 50 डिग्री से ज्यादा होता है। सात मोहर्रम तक इमाम हुसैन के पास जितना खाना और खासकर पानी था वह खत्म हो चुका था।

इमाम सब्र से काम लेते हुए जंग को टालते रहे। 7 से 10 मुहर्रम तक इमाम हुसैन उनके परिवार के मेंबर और अनुनायी भूखे प्यासे रहे। 10 मुहर्रम को इमाम हुसैन की तरफ एक-एक करके गए हुए शख्स ने यजीद की फौज से जंग की। जब इमाम हुसैन के सारे साथी मारे जा चुके थे तब असर (दोपहर) की नमाज के बाद इमाम हुसैन खुद गए और वह भी मारे गए। इस जंग में इमाम हुसैन का एक बेटे जैनुलआबेदीन जिंदा बचे क्योंकि 10 मोहर्रम को वह बीमार थे और बाद में उन्हीं से मुहमम्द साहब की पीढ़ी चली।

इसी कुरबानी की याद में मोहर्रम मनाया जाता है। करबला का यह वाकया इस्लाम की हिफाजत के लिए हजरत मोहम्मद के घराने की तरफ से दी गई कुर्बानी है। इमाम हुसैन और उनके पुरुष साथियों व परिजनों को कत्ल करने के बाद यजीद ने हजरत इमाम हुसैन के परिवार की औरतों को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया।

कैसे मनाया जाता है मोहर्रम

मोहर्रम खुशियों का त्योहार नहीं बल्कि मातम और शोक मनाने का महीना है। इसलिए शिया समुदाय 10 मोहर्रम के दिन काले कपड़े पहनकर हुसैन, उनके परिवार और दोस्तों की शहादत को याद करते हैं। उनकी शहादत को याद करते हुए सड़कों पर जुलूस भी निकाला जाता है और लोग मातम मनाते हैं।